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गुरुवार, 7 जून 2012

गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल
आजुक दुनियां में सब किछ विकाऊ भsगेलै
अनैतिक कुकर्म करैबला कें नाऊ भsगेलै

बेच अप्पन इज्जत कमबै छै टाका रुपैया
ठस ठस गन्हईत छौड़ी सभ कमाऊ भsगेलै

उठलै लोकलाजक पर्दा भsगेलै गर्दा गर्दा
चौक चौराहा नगरबधू के गाँउ ठाऊ भsगेलै

इज्जत केर धज्जी उर्लै एलै केहन जवाना
पुलिस प्रहरी थाना एकर जोगाऊ भsगेलै

वर्ण -17
रचनाकार--प्रभात राय भट्ट

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मंगलवार, 5 जून 2012

हम मनुख, मनुख छी


अहंकार इश्वर कए भोजन छैक
मनुख कए प्रविर्ती छैक
आ दानब कए पोषक छैक

इश्वर हम भय नहि सकै छी
दानब बनै कए तैयार नहि छी
मनुख बनै कए प्रयाश नहि करैत छी

हम मनुख, मनुख छी
मनुखता सँ खसलहुँ त दानव छी
ऊपर भएलहुँ त देबता छी

जगदानन्द झा 'मनु'  

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गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल

मरि रहल छै सीता सन बेट्टी दहेजक खेल में
बेट्टी पुतोहू जरी रहल छै किरोसिन तेल में

बेट्टा के बाप बेचीं रहल छै मालजालक मोल में
बेट्टीबाला के घर घरारी सब लागल छै सेल में

कs देलन घर घरारी दुलहा के नाम नामसारी
बनी गेलाह ओ दाता भिखारी बाप बेट्टा के मेल में

फेर दुलहा मोटर आ गाड़ी लेल कटैय खुर्छारी
कनिया संग आबैय ओ ससुरारी चैढ कS रेल में

नै भेटला सं मोटर गाड़ी कनिया के देलक मारि
दहेजक लोभी ओ बाप बेट्टा चकी पिसैय जेल में

------------वर्ण-१९-----------
रचनाकार-प्रभात राय भट्ट

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