गुरुवार, 21 जून 2012

गजल

आई काईल क' प्रेम प्रीत एकटा जेना खेल भ' गेल छैक
शहेर बंबई केर बड़ा पाव आ पूरी भेल भ' गेल छैक

एकटा क' आंखि सौं दोसर ,तेसर क' कहल प्रेम अहिं सौं
लागै अछि जेना कोनो वस्त्र आभुषनक सेल भ' गेल छैक

नै बुझै माई बहिन नै बुझै काकी मामी भठल छै ई जुग
कहू कतेक यौ नरको में जेना ठेलम ठेल भ' गेल छैक

की बुढ्बा की जुअनका अधेर बालक त' आरो बिगरल
जेना बुझा रहल बिनु टिकट क' कोनो रेल भ' गेल छैक

कहुना अहाँ बचा क' राखु ''रूबी'' बेटी पुतहु केर लाज क'
ई भठीयेल जुग में विद्वानो त' बकलेल भ' गेल छैक

वर्ण --२२
रूबी झा

0 टिप्पणियाँ:

एक टिप्पणी भेजें

  © Mithila Vaani. All rights reserved. Blog Design By: Chandan jha "Radhe" Jitmohan Jha (Jitu)

Back to TOP