शुक्रवार, 30 मार्च 2012

गीत:-

लचक लचक लचकै छौ गोरी तोहर पतरी कमरिया
ठुमैक ठुमैक चलै छे गोरी गिरबैत बाट बिजुरिया //२
देख मोर रूपरंग मोन तोहर काटै चौ किये अहुरिया
सोरह वसंतक चढ़ल जुवानी में गिरबे करतैय बिजुरिया //२ मुखड़ा

चमक चमक चमकैय छौ गोरी तोहर अंग अंग
सभक मोन में भरल उमंग देखैला तोहर रूपरंग
ठुमैक ठुमैक चलै छे गोरी गिरबैत बाट बिजुरिया
रूप लगैय छौ चन्द्रमा सन देह लगैय छौ सिनुरिया //२

सोरह वसंतक चढ़ल जुवानी में गिरबे करतैय बिजुरिया
देख मोर रूपरंग मोन तोहर काटै चौ किये अहुरिया
लाल लाल मोर लहंगा पर चमकैय छै सितारा
देख मोर पातर कमर मोन तोहर भेलौं किया आवारा //२

अजब गजब छौ चाल तोहर गोरिया गोर गोर गाल
कारी बादल सन केश तोहर ठोर छौ लाले लाल
चमकैय छे तू जेना चमकैय गगन में सितारा
देख के तोहर रूपक ज्योति मोन भेलैय हमर आवारा //२

मस्त मस्त नैयना मोर गोर गोर गाल
जोवनक मस्ती चढ़ल हमर ठोर लाले लाल
चमकैय छै मोर रूप जेना चमकैय अगहन के ओस
देख के मोर चढ़ल जुवानी उडीगेलय सभक होस //२
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

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गुरुवार, 29 मार्च 2012


गजल@प्रभात राय भट्ट


               गजल

फुलक डाएरह सुखल सुखल फुल अछी मुर्झाएल
वितल वसंत आएल पतझर देख पंछी पड़ाएल 


भोग विलासक अभिलाषी प्राणी तोहर नै कुनु ठेगाना 
आई एतय काल्हि जएबे जतय फुल अछी रसाएल


अपने सुख में आन्हर प्राणी की जाने ओ आनक दुःख 
दुःख सुख कें संगी प्रीतम दुःख में छोड़ी अछी पड़ाएल 


कांटक गाछ पर खीलल अछी मनमोहक कुमुदिनी 
कांट बिच रहितो कुमुदनी सदिखन अछी मुश्काएल 


बुझल नहीं पियास जकर अछी स्वार्थी महत्वकांक्षा 
होएत अछी तृप्त जे प्रेम में सदिखन अछी गुहाएल


अबिते रहैत छैक जीवन में अनेको उताड चढ़ाव 
सुख में संग दुःख में प्रीतम किएक अछी पड़ाएल
...........वर्ण-२१...................
रचनाकार:-प्रभात राय भ

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मंगलवार, 27 मार्च 2012

गजल


मोनक आस सदिखन बनि कऽ टूटैत अछि।
किछु एना कऽ जिनगी हमर बीतैत अछि।

मेघक घेर मे भेलै सुरूजो मलिन,
ऐ पर खुश भऽ देखू मेघ गरजैत अछि।

हम कोना कऽ बिसरब मधुर मिलनक घडी,
रहि-रहि यादि आबै, मोन तडपैत अछि।

देखै छी कते प्रलाप बिन मतलबक,
चुप अछि ठोढ, बाजै लेल कुहरैत अछि।

मुट्ठी मे धरै छी आगि दिन-राति हम,
जिद मे अपन, "ओम"क हाथ झरकैत अछि।
(बहरे-कबीर)

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सोमवार, 26 मार्च 2012

गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल:-
अप्पन आन सभ लेल अहाँ चिन्हार बनल छि
आS हमरा लेल किएक अनचिन्हार बनल छि

अहाँ एकौ घड़ी हमरा विनु नहीं रहैत छलौं
आई किएक हम अहाँ लेल बेकार बनल छि

कोना बिसरल गेल ओ प्रेमक पल प्रीतम
हमरा बिसारि आन केर गलहार बनल छि

हमर प्रीत में की खोट जे देलौं हृदय में चोट
अहाँक प्रीत में आईयो हम लाचार बनल छि

दिल में हमरा प्रेम जगा किया देलौं अहाँ दगा
दगा नै देब कही कs किएक गद्दार बनल छि

..................वर्ण:-१८............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

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रविवार, 25 मार्च 2012

सगर राति दीप जरय पर साहित्य अकादेमीक कब्जा/ सरकारी पाइपर भेल बभनभोज/ साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त- रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल- ७६म सगर राति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली (रिपोर्ट प्रियंका झा)


-साहित्य अकादेमीक कथा रवीन्द्र दिल्लीमे समाप्त
-रवीन्द्रक कथापर कोनो चर्चा नै भेल
-रवीन्द्रनाथ टैगोरक१५०म जयन्तीपर साहित्य अकादेमीसँ फण्ड लेबा लेल मात्र नाम "कथा रवीन्द्र" राखल गेल
-समाप्ति कालमे संयोजककेँ गलतीक भान भेलन्हि, तखन रवीन्द्रनाथ टैगोरक एकटा कविताक  दू पाँतीक  हिन्दी अनुवाद देवशंकर नवीन पढ़लन्हि
-मात्र १८ टा कथाक पाठ भेल
-७६म सगरराति दीप जरय चेन्नैमे विभारानी लऽ गेली, ओना ई ७७म आयोजन होइतए मुदा किएक तँ साहित्य अकादेमीक फण्डसँ संचालित कथा रवीन्द्र प्रभास कुमार चौधरीक शुरु कएल "सगर राति दीप जरय" क भावनाक अपमान कऽ साहित्य अकादेमीक खिलौना बनि गेल तेँ एकरा "सगर राति दीप जरय"क मान्यता नै देल जा सकल।
-एकटा मैथिली न्यूज पोर्टलक महिला संचालकक पति दारू पीबि कऽ आएल रहथि आ भोजनकालोमे हुनकर मुँह भभकैत छलन्हि। ७५म सगर राति दीप जरयमे दारू पीबापर धनाकर ठाकुर जीक विरोधक बाद कथा रवीन्द्र  मे सेहो ऐ तरहक घटना भेलापर साहित्य जगतमे आक्रोश अछि।
-भोजनक उपरान्त कथास्थल खाली भऽ गेल आ अधिकांश वरिष्ठ कथाकार सूतल देखल गेलाह, प्रभास कुमार चौधरीक कथा लेल भरि रातिक जगरना एकटा मखौल बनि कऽ रहि गेल।
-आयोजक स्वयं ऐ गोष्ठीकेँ बभनभोजक संज्ञा देने रहथि आ अन्ततः सएह सिद्ध भेल।
-ई गोष्ठी सगर राति दीप जरयक अन्त आ साहित्य अकादेमीक गोष्ठीक प्रारम्भ रूपमे देखल जा रहल अछि। "सगर राति दीप जरय" आब साहित्य अकादेमी संपोषित भऽ गेल आ ओकर इशारापर हिन्दीक लोकक कब्जा भऽ गेल, जइमे हिन्दीक पोथीक लोकार्पणसँ लऽ कऽ रवीन्द्रक कविताक हिन्दी अनुवादक दू पाँतीक पाठ धरि सम्मिलित रहल।
-टी.ए., डी.ए. आदिक परम्पराक घृणित आरम्भ साहित्य अकादेमीक फण्डसँ भेल, आ ऐसँ सगर राति दीप जरयक अन्तक प्रारम्भ मानल जा रहल अछि। मुदा साहित्य अकादेमी द्वारा संपोषित कवि-सम्मेलन आ सेमीनारमे टी.ए., डी.ए. सभ कवि निबन्धकारकेँ देल जाइ छन्हि मुदा एतऽ किछुए गोटेकेँ ई सौभाग्य प्राप्त भेल।
-टी.ए., डी.ए. लेल विभारानीपर सेहो जोर देल गेल  मुदा ओ कहलन्हि जे हुनकर आयोजन व्यक्तिगत रहतन्हि तेँ टी.ए., डी.ए. देब हुनका लेल सम्भव नै, जँ कथाकार लोकनि चेन्नै बिना टी.ए. डी.ए. लेने नै जेता तँ ओ ऐ कार्यक्रमकेँ करबा लेल इच्छुक नै छथि। अजित आजाद कहलन्हि जे हुनका टी.ए., डी.ए.भेटतन्हि तखन ओ जेता। कमल मोहन चुन्नू अजित आजादक समर्थन केलन्हि। मुदा टी.ए., डी.ए. आदिक परम्पराक घृणित आरम्भक विरोध आशीष अनचिन्हार केलन्हि तखन जा कऽ मामिला सुलझल।
-विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनीक सभ मैथिली कथा गोष्ठी, सेमीनारमे होइ छल मुदा साहित्य अकादेमीक फण्डिंगक शुरुआतक बाद "कथा रवीन्द्र"मे विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनीक अनुमति नै देबाक पाछाँ फण्ड देनिहार साहित्य अकादेमीक सुविधाजनक दबाब भऽ सकैए, से साहित्यकार लोकनिक बीचमे चर्चा अछि।

[-साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी दिल्लीमे शुरू भेल/ १२ टा पोथीक लोकार्पण भेल जइमे ४ टा हिन्दीक पोथी छल !!
-कथा रवीन्द्र क रूपमे साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिली कथा गोष्ठीक आरम्भ, संयोजक अछि मैलोरंग, देवशंकर नवीन आ प्रकाश
- मैलोरंग एकरा ७६म "सगर राति दीप जरय"क रूपमे आयोजित करबाक नियार केने छल मुदा "सगर राति दीप जरय" मे आइ धरि सरकारी साहित्यिक संस्थासँ फण्ड लेबाक कोनो प्रावधान नै रहै, से ई ७६म "सगर राति दीप जरय"क रूपमे मान्यता नै प्राप्त कऽ सकल।
-साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिलीक ऐ स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़बाक प्रयासक साहित्य जगतमे भर्त्सना कएल जा रहल अछि।
-आशीष चौधरी विदेह मैथिली पोथी प्रदर्शनी लेल पोथी जखन पसारऽ लगलाह तँ साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक (कन्फूजन छल जे ई  ७६म "सगर राति दीप जरय"क आयोजन स्थल छी जे एतऽ एलाक बाद पता लागल जे ई साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक रूपमे हैक कऽ लेल गेल अछि।)  एकटा संयोजक प्रकाश झा तकर अनुमति नै देलखिन्ह, जखन कि एकर सूचना दोसर संयोजक देवशंकर नवीनकेँ दऽ देल गेल छल। प्रकाश झा आशीष चौधरीकेँ कहलखिन्ह जे जँ मंगनीमे पोथी बाँटी तँ तकर अनुमति देल जा सकैए, मुदा तकर कोनो सम्भावनासँ आशीष चौधरी मना केलन्हि । तकर बाद आशीष चौधरी विदेहक सम्पादक गजेन्द्र ठाकुरक संग अपन पोथी लऽ कऽ ओतऽ सँ बहरा गेलाह। ऐ कारणसँ किछु मैथिली पोथीक लोकार्पण नै भेल (जे ओना ७६म "सगर राति दीप जरय"मे लोकार्पण लेल आएल छल साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी लेल नै।) ।  ई पहिल बेर अछि जखन कोनो मैथिली गोष्ठीमे मैथिली पोथी बेचबाक अनुमति नै देल गेल, हँ कन्नारोहट होइत रहैए जे मैथिलीमे पोथी नै बिकाइए। साहित्य जगतमे ऐ तरहक जातिवादी गोष्ठी द्वारा कएल जा रहल सरकारी फण्डक मैथिलीक नामपर दुरुपयोगपर चिन्ता व्यक्त कएल जा रहल अछि।
-गजेन्द्र ठाकुर फेसबुकपर लिखलन्हि- जगदीश प्रसाद मण्डल, बेचन ठाकुर, कपिलेश्वर राउत, राजदेव मण्डल, उमेश पासवान, अच्छेलालशास्त्री, दुर्गानन्द मण्डल आदि श्रेष्ठ कथाकार लोकनिकेँ एकटा पोस्टकार्डो नै देबाक आयोजन मण्डलक निर्णय अद्भुत अछि, ओना तै सँ ऐ लेखक सभक स्टेचरपर कोनो फर्क नै पड़तन्हि। भऽ सकैए ७५म गोष्ठीक आयोजक अशोक आ कमलमोहन चुन्नू वर्तमान आयोजककेँ हुनकर सभक पता सायास वा अनायास नै देने हेथिन्ह आ वर्तमान आयोजक केँ से सुविधाजनक लागल हेतन्हि। जगदीश प्रसाद मण्डलजीक आयोजनमे सभ धोआधोतीधारी आ चन्दन टीका पाग धारी भोज खा आएल छथि, मुदा बजेबा कालमे अपन आयोजनकेँ बभनभोज बनेबापर बिर्त छथि।..ओना ई आयोजन साहित्य अकादेमीक फण्डसँ आयोजित भऽ रहल अछि आ एकरा साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी मात्र मानल जाए। मैथिली साहित्यक इतिहासमे ७६ म सगर राति दीप जरयक रूपमे ऐ जातिवादी गोष्ठीकेँ मान्यता नै देल जा सकत। साहित्य अकादेमीक मैथिली विभागक जातिवादी चेहरा एक बेर फेर सोझाँ आएल अछि जखन ओ मैथिलीक एकमात्र स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़ि देलक। पवन कुमार साह लिखलन्हि-काल्हि‍ धरि‍ सगर राति‍क आयोजक कोनो संस्‍था नै होइ छल। मुदा आब ई वंधन टूटि‍ गेल।
-साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक पहिल सत्रमे विभूति आनन्द (छाहरि), मेनका मल्लिक (मलहम) आ प्रवीण भारद्वाजक (पुरुखारख) कथाक पाठ भेल।  
-साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठी अध्यक्षता गंगेश गुंजन कऽ रहल छथि।
-कथापर समीक्षा अशोक मेहता आ रमानन्द झा रमण केलन्हि। अशोक मेहता कहलन्हि जे विभूति आनन्दक कथामे किछु शब्दक प्रयोग खटकल। मेनका मल्लिकक भाषाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे एतेक दिनसँ बेगूसरायमे रहलाक बादो हुनकर भाषा अखनो दरभंगा, मधुबनीयेक अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे कथाकार नव छथि से तै हिसाबे हुनकर कथा नीक छन्हि।
-रमानन्द झा रमण विभूति आनन्दक कथामे हिन्दी शब्दक बाहुल्यपर चिन्ता व्यक्त केलन्हि। मेनका मल्लिकक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे महिला लेखन आगाँ बढ़ल अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक भाषाकेँ ओ नैबन्धिक कहलन्हि आ आशा केलन्हि जे आगाँ जा कऽ हुनकर भाषा ठीक भऽ जेतन्हि।
-तकर बाद श्रोताक बेर आएल, सौम्या झा विभूति आनन्दक कथाकेँ अपूर्ण कहलन्हि, मुदा हुनका ई कथा नीक लगलन्हि।  आशीष अनचिन्हार विभूति आनन्दसँ हुनकर कथाक एकटा टेक्निकल शब्द "अभद्र मिस कॉल"क  अर्थ पुछलन्हि तँ देवशंकर नवीन राजकमलक कोनो कथाक असन्दर्भित तथ्यपर २० मिनट धरि विभूति आनन्द जीक बचाव करैत रहला, अनन्तः विभूति आनन्द श्रोताक प्रश्नक उत्तर नै देलन्हि।
-दोसर सत्रमे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ, विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण, आ दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारक पाठ भेल।  विभा रानीक कथा पर समीक्षा करैत मलंगिया एकरा बोल्ड कथा कहलन्हि, सारंगकुमार कथोपकथनकेँ छोट करबा लेल कहलन्हि, कमल कान्त झा एकरा अस्वभाविक कथा कहलन्हि आ कहलन्हि जे माए बेटाक अवहेलना नै कऽ सकैए, मुदा श्रीधरम कहलन्हि जे जँ बेटाक चरित्र बदलतै तँ मायोक चरित्र बदलतै। कमल मोहन चुन्नू कहलन्हि जे ई कथा घरबाहर मे प्रकाशित अछि। आयोजक कहलन्हि जे  विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ केँ ऐ गोष्ठीसँ बाहर कएल जा रहल अछि।
विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण पर मलंगिया जीक विचार छल जे ई उमेरक हिसाबे प्रेमकथा अछि। सारंग कुमार एकरा महानगरीय कथा कहलन्हि मुदा एकर गढ़निकेँ मजगूत करबाक आवश्यकता अछि, कहलन्हि। श्रीधरम ऐ कथामे लेखकीय इमानदारी देखलन्हि मुदा एकर पुनर्लेखनक आवश्यकतापर जोर देलन्हि। हीरेन्द्रकेँ ई कथा गुलशन नन्दाक कथा मोन पाड़लकन्हि मुदा प्रदीप बिहारी हीरेन्द्रक गपसँ सहमत नै रहथि। ओ एकरा आइ काल्हिक खाढ़ीक कथा कहलन्हि।दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारपर मलंगिया जी किछु नै बजला, ओ कहलन्हि जे ओ ई कथा नै सुनलन्हि। सारंग कुमार एकरा रेखाचित्र कहलन्हि। कमलकान्त झाकेँ ई संस्कारी कथा लगलन्हि। श्रीधरमकेँ आरम्भ नीक आ अन्त खराप लगलन्हि। शुभेन्दु शेखरकेँ जेनेरेशन गैप  सन लगलन्हि आ कमल मोहन चुन्नूकेँ ई यात्रा वृत्तान्त लगलन्हि। दोसर सत्रमे श्रोताक सहभागिता शून्य रहल।..आशीष अनचिन्हार]
प्रभाष कुमार चौधरीक छातीपर औंघाइत---रमानंद झा "रमण" (चित्र साभार आशीष अनचिन्हार)  

प्रभाष कुमार चौधरीक छातीपर सूतल मैथिलीक कुभंकर्ण---महेन्द्र मलंगिया  (चित्र साभार आशीष अनचिन्हार) 

प्रभाष कुमार चौधरीक छातीपर सूतल मैथिलीक कुभंकर्ण---विभूति आनंद (चित्र साभार आशीष अनचिन्हार)

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"सगर राति दीप जरय"केर अन्त आ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीक उदय (रिपोर्ट आशीष अनचिन्हार)


"सगर राति दीप जरय"केर अन्त आ साहित्य अकादेमी कथा गोष्ठीक उदय (रिपोर्ट आशीष अनचिन्हार) २१ जुलाइ २००७केँ सहरसा "सगर राति दीप जरय"मे जीवकांत जी मैथिलीकेँ राजरोगसँ ग्रसित हेबाक संकेत देने छलाह। आ तकरा बाद लेखक सभकेँ मैथिलीकेँ ऐ राजरोगसँ बचेबाक आग्रह रमानंद झा रमण केने छलाह। मुदा हमरा जनैत- ई मात्र सुग्गा-रटन्त भेल। कारण ई राजरोग आस्ते-आस्ते जीवकांत जी आ रमण जीक आँखिक सामने मैथिलीकेँ गछाड़ि लेलकै। मैथिलीक ई रोगक बेमरिआह स्वरूप आर बेसी फरिच्छ भऽ कऽ दिल्लीक धरतीपर "मैलोरंग" द्वारा संचालित आ साहित्य अकादेमीक पाइक बलें कुदैत "सगर राति दीप जरय" मैथिली भाषाकेँ मारि देलक। 

२४ मार्च २०१२केँ साँझ धरिलोक भ्रममे छल जे दिल्लीमे "सगर राति दीप जरए" केर आयोजन भऽ रहल छै। संयोजक देवशंकर नवीन माला उठेने रहथि, मुदा आगाँ प्रकाश आ फेर मैलोरंग नै जानि कतऽ सँ आबि गेलै, आ अतत्तः तखन भेलै जे बादमे पता चललै जे ओ सगर राति नै छल ओ तँ "मैलोरंग" द्वारा संचालित आ साहित्य अकादेमीक पाइसँ आयोजित मात्र कथा गोष्ठी छल। मैलोरंग एकरा ७६म "सगर राति दीप जरय"क रूपमे आयोजित करबाक नियार केने छल मुदा "सगर राति दीप जरय" मे आइ धरि सरकारी साहित्यिक संस्थासँ फण्ड लेबाक कोनो प्रावधान नै रहै, से ई ७६म "सगर राति दीप जरय"क क्रम टूटि गेलै आ तँए ई ७६ कथा गोष्ठीक रूपमे मान्यता नै प्राप्त कऽ सकल। पाइ साहित्य अकादेमीक लागल छलै एकर प्रमाण फोटो सभमे सहयोगक रूपे " साहित्य अकादेमी"क नाम देखाइ स्पष्ट रूपे पड़त। आ अकादेमीक पर्यवेक्षकक रूपमे देवेन्द्र कुमार देवेश आएल छलाह। साहित्य अकादेमी द्वारा मैथिलीक ऐ एकमात्र स्वायत्त गोष्ठीकेँ तोड़बाक प्रयासक साहित्य जगतमे भर्त्सना कएल जा रहल अछि। ओना हम स्पष्ट कही जे राजरोगकेँ हटेबाक बात करए बला रमानंद झा रमण सेहो ऐ कूकृत्यकेँ आँखिसँ देखलन्हि आ मौन सम्मति देलनि। आब चूँकि ई "सगर राति दीप जरए" नै छल तँए आगूक एकर विवेचन हम मात्र कथा गोष्ठीक रूपमे करब। चूँकि लोकमे भ्रम पैदा कएल गेल छलै जे ई "सगर राति दीप जरए" अछि तँए विदेह दिससँ पोथीक स्टाल लगाएल जा रहल छल कथा स्थलपर, मुदा ओही समय "मैलोरंग"केर कर्ता-धर्ता प्रकाश झा द्वारा ऐपर रोक लगा देल गेलै। प्रकाश जी कहलखिन्ह जे जँ फ्रीमे बँटबै तखने स्टाल संभव हएत। मुदा हुनक विचारकेँ स्टाल व्यवस्थापक आशीष चौधरी द्वारा नकारि देल गेल। आ एकर विरोधमे विदेहक संपादक गजेन्द्र ठाकुर कथास्थलसँ निकलि गेलाह। ऐकथा गोष्ठीक शुरूआतमे ओना हम अपने फेसबूकपर घोषणा केने रही जे गजल आ हाइकूक पोस्टर प्रदर्शनी करब सगर रातिमे, मुदा जखन ओ सगर रात छलैहे नै तखन हम सभ कतए करब आ ताहिपर विदेह पोथी स्टालक विरोधक बाद! हमरा लोकनि एकर विरोध करैत ऐ पोस्टर प्रदर्शनीकेँ स्थगित कऽ देलौं। ऐ कथा गोष्ठीक आरंभ बारह गोट पोथीक विमोचनसँ भेल। जइमे कुल पाँच हिन्दी-उर्दूक पोथी छल आ सातटा मैथिलीक। 

ई कथा गोष्ठी आठ सत्रमे बाँटल छल। अध्यक्ष छलाह गंगेश गुंजन आ संचालक छलाह अजित कुमार अजाद। 

साहित्य अकादेमीक कथा गोष्ठीक पहिल सत्रमे विभूति आनन्द (छाहरि), मेनका मल्लिक(मलहम) आ प्रवीण भारद्वाजक (पुरुखारख) कथाक पाठ भेल। कथापर समीक्षा अशोक मेहता आ रमानन्द झा रमण केलन्हि। अशोक मेहता कहलन्हि जे विभूति आनन्दक कथामे किछु शब्दक प्रयोग खटकल। मेनका मल्लिकक भाषाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे एतेक दिनसँ बेगूसरायमे रहलाक बादो हुनकर भाषा अखनो दरभंगा, मधुबनीयेक अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे कथाकार नव छथि से तै हिसाबे हुनकर कथा नीक छन्हि। रमानन्द झा रमण विभूति आनन्दक कथामे हिन्दी शब्दक बाहुल्यपर चिन्ता व्यक्त केलन्हि। मेनका मल्लिकक कथाक सन्दर्भमे ओ कहलन्हि जे महिला लेखन आगाँ बढ़ल अछि। प्रवीण भारद्वाजक कथाक भाषाकेँ ओ नैबन्धिक कहलन्हि आ आशा केलन्हि जे आगाँ जा कऽ हुनकर भाषा ठीक भऽ जेतन्हि। तकर बाद श्रोताक बेर आएल, सौम्या झा विभूति आनन्दक कथाकेँ अपूर्ण, ओइ इलाकासँ कटल लगलन्ह् मुदा ओ कहलन्हि जे हुनका ई कथा नीक लगलन्हि मुदा ऐमे कमी छै, देवशंकर नवीन विभूति आनन्दक पक्षमे बीच बचावमे (!!!) एलाह मुदा सौम्या झा अपन बातपर अडिग रहलीह। आशीष अनचिन्हार विभूति आनन्दसँ हुनकर कथाक एकटा टेक्निकल शब्द "अभद्र मिस कॉल"क अर्थ पुछलन्हि तँ देवशंकर नवीन राजकमलक कोनो कथाक असन्दर्भित तथ्यपर २० मिनट धरि विभूति आनन्दक पक्षमे बीच बचाव करैत रहला (!!!), अनन्तः विभूति आनन्द श्रोताक प्रश्नक उत्तर नै देलन्हि। दोसर सत्रमे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ, विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण, आ दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारक पाठ भेल। विभा रानीक कथा पर समीक्षा करैत मलंगिया एकरा बोल्ड कथा कहलन्हि, सारंग कुमार कथोपकथनकेँ छोट करबा लेल कहलन्हि, कमल कान्त झा एकरा अस्वभाविक कथा कहलन्हि आ कहलन्हि जे माए बेटाक अवहेलना नै कऽ सकैए, मुदा श्रीधरम कहलन्हि जे जँ बेटाक चरित्र बदलतै तँ मायोक चरित्र बदलतै। कमल मोहन चुन्नू कहलन्हि जे ई कथा घरबाहर मे प्रकाशित अछि। आयोजक कहलन्हि जे विभा रानीक कथा सपनकेँ नै भरमाउ केँ ऐ गोष्ठीसँ बाहर कएल जा रहल अछि। विनीत उत्पलक कथा निमंत्रण पर मलंगिया जीक विचार छल जे ई उमेरक हिसाबे प्रेमकथा अछि। सारंग कुमार एकरा महानगरीय कथा कहलन्हि मुदा एकर गढ़निकेँ मजगूत करबाक आवश्यकता अछि, कहलन्हि। श्रीधरम ऐ कथामे लेखकीय ईमानदारी देखलन्हि मुदा एकर पुनर्लेखनक आवश्यकतापर जोर देलन्हि। हीरेन्द्रकेँ ई कथा गुलशन नन्दाक कथा मोन पाड़लकन्हि मुदा प्रदीप बिहारी हीरेन्द्रक गपसँ सहमत नै रहथि। ओ एकरा आइ काल्हिक खाढ़ीक कथा कहलन्हि।दुखमोचन झाक छुटैत संस्कारपर मलंगिया जी किछु नै बजला, ओ कहलन्हि जे ओ ई कथा नै सुनलन्हि। सारंग कुमार एकरा रेखाचित्र कहलन्हि। कमलकान्त झाकेँ ई संस्कारी कथा लगलन्हि। श्रीधरमकेँ आरम्भ नीक आ अन्त खराप लगलन्हि। शुभेन्दु शेखरकेँ जेनेरेशन गैप सन लगलन्हि आ कमल मोहन चुन्नूकेँ ई यात्रा वृत्तान्त लगलन्हि। दोसर सत्रमे श्रोताक सहभागिया शून्य जकाँ रहल। 


दोसर सत्रक बाद भोजन भेल। भोजनमे भात-दालि तरकारी, भुजिया-पापड़, दही आ चिन्नी बेसी बला रसगुल्ला छल। आ भोजनक बाद शून्यकाल। शून्यकाल केर माने जे भोजन करू आ कथा स्थलकेँ शून्य करू। मुदा अधिकाशं छलाहे आ किछु जेनाकी विभूति आनंद शून्यमे विलीन भऽ गेल छला। शून्य कालक दौरान हीरेन्द्र कुमार झा द्वारा मैथिलीमे बाल साहित्यकेर विकासक बात राखल गेल। ओ जोर देलन्हि जे बाल साहित्य मुफ्तमे बाँटल जेबाक चाही। किछु गोटेँ ऐ बातपर जोर देलन्हि जे भविष्यमे जे सगर राति हएत ओइमे सँ कोनो एकटा आयोजन पूरा-पूरी बालकथा पर हेबाक चाही। मुदा आशचर्यक विखय ई रहल जे देवशंकर नवीन" इंटरनेट पर विदेहक माध्यमे आबैत बाल साहित्यकेँ बिसरि गेलह जखन की ओ इंटरनेटक गतिविधिसँ परिचित छथि। ओही क्रममे आशीष अनचिन्हार द्वारा हीरेन्द्र जीकेँ मुफ्त डाउनलोड प्रक्रिया बताएल गेल। मुदा नतीजा वएह- जनैत-बुझैत इंटरनेटपर सुलभ बाल साहित्यकेँ एकटा सुनियोजित तरीकासँ कात कएल गेल। बात जखन हरेक विधामे बाल साहित्य लिखबा पर आएल तखन पहिल बेर आशीष अनचिन्हार द्वारा मैथिलीमे "बाल गजल" केर परिकल्पना देल गेल। मुदा एकटा बात रोचक जे बाल साहित्यकेर चर्चा पुरस्कारक बात पर अटकि गेलै। किनको ई दुख छलन्हि जे आब हमर सबहक उम्र बीति गेल तखन ई शुरू भेल। तँ किनको ई दुख छलन्हि जे अमुक अपन कनियाँ केर नामसँ व्योंतमे लागल छथि। ऐ बहसक दौरान अविनाश जी ऐ बातपर जोर देलन्हि जे "बाल कथा"क तर्ज पर "व्यस्क कथा" सेहो हेबाक चाही। ओना जे पटना सगर रातिमे सहभागी हेताह से अविनाश जीसँ नीक जकाँ परिचित हेताह से उम्मेद अछि। 
धनाकर जीक रंगीन जलपर रिपोर्ट कएक ठाम आएल अछि(विदेह फेसबुक आ घर बाहरमे सेहो)। 

शून्यकालक बाद तेसर स्तर शुरू भेल- ई विशुद्भ रूपे विहनि कथापर आधारित छल। ऐमे मुन्ना जी चश्मा, सेवक आ कट्टरपंथी नामक तीन टा विहनि कथा पढलन्हि। अरविन्द ठाकुर दूगोट विहनि कथा-दाम आ अगम-अगोचर पढलन्हि। प्रदीप बिहारी बूड़ि नामक विहनि कथा पढ़लन्हि। ऐ सत्रक मुख्य बात ई रहल जे मुन्ना जी लघुकथा नै बल्कि विहनि कथा कहबा पर जोर देलन्हि मुदा हुनकर उन्टा अशोक मेहता कहलन्हि जे लघुकथा नाम ठीक छै। ऐ सत्रमे मुन्ना जी सगर रातिकेर कोनो एकटा आयोजन विहनि कथापर करबा पर जोर देलन्हि। श्रोतामेसँ आशीष अनचिन्हार मुन्ना जीक विहनिकथा "चश्मा"केँ आधुनिक जीवनमे पनपैत नकली संवेदनाकेँ देखार करैत कथा कहलन्हि। ऐसँ पहिने देवशंकर नवीन जी समाजमे पसरैत असंवेदनाकेँ रेखांकित केने छलाह अपन वक्त्व्यमे। अनचिन्हार संवेदनाक एहू पक्षपर नवीन जीकेँ धेआन देओलखिन्ह। ऐ विहनि कथा सभपर अनेक टिप्पणी सभ आएल। मुदा वएह जे नीक लागल, बड्ड नीक आदि फर्मेटमे। 


चारिम सत्रमे हीरेन्द्र कुमार झाक दीर्घकथा " एकटा छल गाम" आ पंकज सत्यम केर कथा " एकटा विक्षिप्तक चिट्ठी" आएल। एकटा छल गाम पर चुन्नू जी कहलखिन्ह जे कथा बेसी नमरल अछि मुदा कथ्य नीक अछि। श्री धरम जी चुन्नू जीक आलोचनासँ सहमत छलाह। संगे संग चुन्नू जी कहलखिन्ह जे ऐमे गामक चिंता नीक जकाँ आएल अछि। आ श्रीधरम कहलखिन्ह जे दलित उभार जँ ऐकथामे अबितै तँ आर नीक रहितै। श्रोता वर्गसँ आशीष अनचिन्हार द्वारा कमल मोहन चुन्नू जीकेँ कहल गेलन्हि जे या तँ ओ जगदीश प्रसाद मंडलक कथा नै पढने छथि वा बिसरि गेल छथि। जँ चुन्नू जी जगदीश मंडल जीक कथामे अबैत गामक चिंताक बाटे हीरेन्द्र जीक गामक चिन्ता देखथि तँ ओ आरो नीक जकाँ आलोचना कऽ सकै छलाह। हमर ऐ बात पर आयोजकक एकटा परम ब्राम्हणवादी सदस्य कहलाह जे अहाँ जगदीश मंडल जीक कथाक उदाहरण दिअ हम देबए लेल तैयार छलहुँ मुदा संचालक ओइ ब्राम्हणवादी सदस्यकेँ बतकुट्टौलि करबासँ रोकि देलन्हि। ऐ सत्रक आन आलोचक सभ प्रदीप बिहारी, अविनाश, रमण कुमार सिंह आदि छलाह। 


पाँचम सत्रमे दीनबंधु जीक कथा "अपराधी", विनयमोहन जगदीश जी "संकल्पक बल" आ आशीष अनचिन्हारक "काटल कथा" पढ़ल गेल।आशीष अनचिन्हारक कथा पर चुन्नू जी कहलाह जे शिल्प क तौर पर ई असफल कथा अछि संगे संग कोन बात कतए छै से स्पष्ट नै छै। पाठक कन्फ्यूज्ड भऽ जाइत छथि। ऐबातकेँ आर बिस्तार दैत कमलेश किशोर झा कहलखिन्ह जे ऐ कथामे सेन्ट्रल प्वांइट केर अभाव छै। मुकेश झा कहलखिन्ह जे अनचिन्हार जीकेँ कोनो डाक्टर नै कहने छथिन्ह जे अहाँ कथा लीखू। तेनाहिते आशीष झा( पति कुमुद सिंह) कहलखिन्ह जे हमरा आधा बुझाएल आधा नै बुझाएल ई कथा छल की रिपोर्ट से नै पता। विनयमोहन जगदीश जी पर चुन्नु जी कहलखिन्ह जे कथामे नमार बेसी छै। ई लोकनि दीनबंधु जीक कथाक सेहो आलोचना केलन्हि मुदा चलंत स्टाइलमे। 

छठम सत्रमे काश्यप कमल जीक दीर्घकथा- भोट, कमलेश किशोर झाक -गुदरिया पढल गेल। लिस्टमे तँ कौशल झाक न्याय नामक कथा सेहो छल मुदा पढ़बा काल धरि ओ स्थल पर नै छलाह। भोट कथा पर मुन्ना जीक कहब छलन्हि जे हँसीसँ सूतल लोककेँ जगा देलक ई कथा। कमलेश जीक कथा सेहो नीक छल मुदा वएह चलंत आलोचना। 

सातम सत्रमे अशोक कुमार मेहता-"बाइट", कमलकांत झा -"विद्दति" आ महेन्द्र मलंगिया जीक कथा- लंच (वाचन प्रकाश झा) आएल। हीरेन्द्र झा मेहता जीक कथाकेँ कमजोर गढ़निक मानलन्हि। कमलकांत जीक कथाकेँ सुन्दर वर्णनात्मक खास कऽ बस बला प्रसंग केँ नीक कहलखिन्ह। मलंगिया जीक कथाकेँ नीक तँ कहलखिन्ह मुदा इहो कहलखिन्ह जे अंत एकर कमजोर छै। चुन्नू जी बाइट कथाक गढ़निकेँ कमजोर मानलन्हि आ कमलकांत आ मलंगिया जीक कथाकेँ अपराधिक पृष्ठभूमि बला मानलन्हि। 

आठम सत्र अध्यक्षीय भाषण आ हुनक शीर्षक हीन मौखिक कथासँ समाप्त भेल। एतेक भेलाकेँ बाद अगिला सगर राति ( के जानए जे फेर कथा गोष्ठी)क संयोजक केर खोज शुरू भेल। पहिल प्रस्ताव अरविन्द ठाकुर सुपौल लेल देलखिन्ह आ दोसर विभारानी चेन्नै लेल। आ तेसर प्रस्ताव दिल्लीसँ भवेश नंदन जीक छलन्हि। सभसँ राय पूछल गलै। बहुत गोटेँ चेन्नैक पक्षमे एलाह। अंततः ७६म "सगर राति दीप जरय"क विभारानीकेँ रूपमे एकटा महिला संयोजक सगर रातिके भेटल|

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गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल
अनचिन्हार सं जहिया चिन्ह्जान बढल
तहिया सं हमरा नव पहिचान भेटल

विनु भाऊ बिकैत छलहूँ हम बाजार में
आई अनमोल रत्न मान सम्मान भेटल

काल्हि तक हमरा लेल छल अनचिन्हार
आई हमरा लेल ओ हमर जान बनल

अन्हरिया राईत में चलैत छलहूँ हम
विनु ज्योति कहाँ कतौ प्रकाशमान भेटल

प्रभात केर अतृप्त तृष्णा ओतए मेटल
जतए अनचिन्हार सन विद्द्वान भेटल
.............वर्ण:-१६.................
रचनाकार :-प्रभात राय भट्ट

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शुक्रवार, 23 मार्च 2012

गीत


बड्ड आस धेने हम एलौं शरण, अहींक पुत्र थीकौं माँ।
रहऽ दियौ हमरा अपन चरण, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

लाल रंग अँचरी, लाले रंग टिकुली, माँ केर आसन लाले-लाल,
सिंहक सवारी शोभै, हाथ मे त्रिशूल, अहाँक चमकैए भाल।
करै छी वन्दना धरती सँ गगन, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

आंगन नीपेलौं, अहाँक पीढी धोएलौं, छी फूल लेने ठाढ,
दियौ दरसन माँ, दुख करू संहार, भरू सुख सँ संसार।
अहीं कहू हम करी कोन जतन, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

नै चाही अन धन, नै चाही जोबन, खाली शरण माँगै छी,
सुनू हमरो पुकार, भरू ज्ञानक भण्डार, एतबा वचन माँगै छी।
कहिया देबै अहाँ हमरा दर्शन, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

जपै छी नाम अहींक, हम सब राति दिन, तकियौ एक बेर,
करू हमर उद्धार, लगाबू बेडा पार, नै ए कोनो कछेर।
अछि नोर भरल "ओम"क नयन, अहींक पुत्र थीकौं माँ।

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गुरुवार, 22 मार्च 2012

परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ@प्रभात राय भट्ट



मिथिला के हम बेट्टी छि मैथिलि हमर नाम यौ
जनक हमर पिता छथि जनकपुर हमर गाम यौ
जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

मिथिला के हम बेट्टा ची मिथिलेश हमर नाम यौ
मिथिला के हम वासी छि जनकपुर हमर गाम यौ
ऋषि महर्षि केर कर्मभूमि अछि मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

मिथिलाक मैट सं अवतरित भेल्हीं सीता जिनकर नाम यौ
उगना बनी महादेव एलाह पाहून बनी कय राम यौ
धन्य धन्य अछि मिथिलाधाम,मिथिलाधाम जगमे महान यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

हिमगिरी के कोख सं ससरल कमला कोशी बल्हान यौ
मिथिला के शान बढौलन मंडन,कुमारिल,वाचस्पति विद्द्वान यौ
हमर जन्मभूमि कर्मभूमि स्वर्गभूमि मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

कपिल कणाद गौतम अछि मिथिलाक शान यौ
विद्यापति के बाते अनमोल ओ छथि मिथिलाक पहिचान यौ
जगमे भेटत नै कतहूँ एहन सुन्दर मिथिलाधाम यौ
परम पावन पुन्यभूमि अछि अपने मिथिलाधाम यौ

रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

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बुधवार, 21 मार्च 2012

गजल


जीनाइ भेलै महँग, एतय मरब सस्त छै।
महँगीक चाँगुर गडल, जेबी सभक पस्त छै।

जनता ढुकै भाँड मे, चिन्ता चुनावक बनल,
मुर्दा बनल लोक, नेता सब कते मस्त छै।

किछु नै कियो बाजि रहलै नंगटे नाच पर,
बेमार छै टोल, लागै पीलिया ग्रस्त छै।

खसि रहल देबाल नैतिकताक नित बाट मे,
आनक कहाँ, लोक अपने सोच मे मस्त छै।

चमकत कपारक सुरूजो, आस पूरत सभक,
चिन्तित किया "ओम" रहतै, भेल नै अस्त छै।
(बहरे-बसीत)

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प्राचीन मिथिला@प्रभात राय भट्ट



मिथिला के मिथिलेश्वर महादेव हम की कहू यौ
स्वम अहाँ छि अन्तरयामी अहाँ सभटा जनैतछी यौ
बसुधाक हृदय छल हमर महान मिथिला
इ हमही नै शाश्त्र पुराण कहैय यौ

मिथिलाक जन जन छलाह जनक एही ठाम
ताहि लेल नाम पडल जनकपुर धाम
राजा जनक छलाह राजर्षि जनकपुरधाम में
सीता अवतरित भेलन्हि मिथिले गाम में

मिथिलाक पाहून बनी ऐलाह चारो भाई राम
विद्यापती के चाकर बनलाह उगना एहि ठाम
चारो दिस अहिं छि महादेव जनकपुर के द्वारपाल
पुव दिस मिथिलेश्वरनाथ पश्चिम जलेश्वरनाथ

उत्तर दिस टूटेश्वरनाथ दक्षिण कलानेश्वरनाथ
किनहू भs सकय मिथिलाक प्राणी अनाथ
इ ध्रुव सत्य अछि प्राचीन मिथिलाक परिभाषा
एखुनो अछि एहन सुन्दर मिथिलाक अभिलाषा

रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

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गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल:-
अहाँ विनु जिन्गी हमर बाँझ पडल अछि
सनेह केर पियासल काया जरल अछि


दूर रहितो प्रीतम अहाँ मोन पडैत छि
प्रीतम अहिं सं मोनक तार जुडल अछि


तडपैछि अहाँ विनु जेना जल विनु मीन
अहाँ विनु जिया हमर निरसल अछि


नेह लगा प्रीतम किया देलौं एहन दगा
मधुर मिलन लेल जिन्गी तरसल अछि


अहाँ विनु प्रीतम जीवन व्यर्थ लगैय
की अहाँक प्रेमक अर्थ नहीं बुझल अछि
..............वर्ण-१६...........
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

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सोमवार, 19 मार्च 2012

बेटी अहाँ विद्यालय जाउ !

भले जे हेतै बाद में देखबै - एखन अहाँ विद्यालय जाउ!
शिक्षा के शक्ति जगके जननी - अहुँ अपन अस्मिता बनाउ!
जुनि पिछड़ू कोनो विधामें पाछू - अस्तित्वक रक्षा-किला बनाउ!
बेटी अहाँ विद्यालय जाउ!

देखू आइ संसार में नारी - अग्रपाँति नेत्री बनि चलैथ!
जतय दहेजक चाप आ मारि - सैह समाज पिछड़ल छैथ!
शिक्षाके पूँजी सभसऽ बड़का - दहेज-दान के त्याग कराउ!
बेटी अहाँ विद्यालय जाउ!

भारतमें नारी छथि आगू - मिथिला बेसी पिछड़ल अछि!
बीति गेल देखू कते जमाना - गार्गी - भारती पड़ल अछि!
पुनः प्रीतिके रीति सऽ सभके - अपन दिव्य शक्तिके देखाउ!
बेटी अहाँ विद्यालय जाउ!

रचना:- प्रवीन नारायण चौधरी

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दहेज !

दहेजक नाम सुनि कऽ
कांइपि उठैत अछि ,माए-बापऽक करेज
कतबो छटपटायब तऽ
लड़कवला कम नहि करताह अपन दहेज।
ओ कहताह, जे बियाह करबाक अछि
तऽ हमरा देबैह परत दहेज
पाई नहि अछि तऽ
बेच लिय अपना जमीनऽक दस्तावेज।
दहेज बिना कोना कऽ करब
हम अपना बेटाक मैरेज
दहेज नहि लेला सऽंॅ खराब होयत
समाज में हमर इमेज।
एहि मॉडर्न जुग मे तऽ
एहेन होइत अछि मैरेज
आयल बरियाति घूरीकऽ जाइत छथि
जऽंॅ कनियो कम होइत अछि दहेज।
मादा-भूर्ण आओर नव कनियाक
जान लऽ लैत अछि इ दहेज
ई सभ देखि सूनि कऽ
काइपि उठैत अछि ‘किशन’ के करेज।
समाज के बरबाद केने
जा रहल अछि ई दहेज
बचेबाक अछि समाज के तऽ
हटा दियौ ई मुद्रारूपी दहेज।
खाउ एखने सपत ,करू प्रतिज्ञा
जे आब नहि मॅंागब दहेज
बिन दहेजक हेतै आब सभ ठाम
सभहक बेटीक मैरेज।

लेखक:- किशन कारीगर

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रविवार, 18 मार्च 2012

गजल@प्रभात राय भट्ट



गजल:-
वसंत ऋतू में आएल सगरो वसंत बहार
वनस्पतिक पराग गमकौने अनन्त संसार


हरियर पियर उज्जर पुष्प आर लाले लाल
पुष्पक राग केर उत्कर्ष अछि वसंत बहार


झूमी रहल कियो गाबी रहल नाचे कियो नाच
पलवित भेल प्रेम मोन में अनन्त उद्गार


सीतल सुन्दर सजल बहैय वसंत पवन
मनोरम प्रकृतिक दृश्य अछि वसंत बहार


मोर मयूरक नृत्य मधुवन कुह्कैय कोईली
मधुर मुस्कान सगरो आनंद अनन्त संसार


प्रेम मिलन मग्न प्रेमी पुष्पित वसंत बहार
मोन उपवन सुरभित भेल अनन्त संसार
.............वर्ण-१८.............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

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गुरुवार, 15 मार्च 2012

रेल बॅज्ट 2012-13 मे लागू काईल गेल नव ट्रेन


रेल बॅज्ट 2012-13 मे लागू काईल गेल नव ट्रेन

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1.माख्या - लोकमान्य तिलक टर्मिनस एसी एक्सप्रेस ( कटिहार , मुगलसराय , इटारसी के रास्ते वीकली )
2 . सिकंदराबाद - शालीमार एसी एक्सप्रेस ( वीकली - विजयवाड़ा के रास्ते )
3 . बांद्रा टर्मिनस - भुज एसी एक्सप्रेस ( सप्ताह में तीन दिन )
4 . दिल्ली सराय रोहिल्ला - ऊधमपुर एसी एक्सप्रेस ( अंबाला , जालंधर के रास्ते सप्ताह में तीन दिन )
5 . कोयंबटूर - बीकानेर एसी एक्सप्रेस ( रोहा वसई रोड , अहमदाबाद , जोधपुर के रास्ते साप्ताहिक )
6 . काकीनाडा - सिकंदराबाद एसी एक्सप्रेस ( सप्ताह में तीन दिन )
7 . यशवंतपुर - कोचुवेली एसी एक्सप्रेस ( साप्ताहिक )
8 . चेन्नै बेंगलुरु एसी डबल डेकर एक्सप्रेस ( दैनिक )
9 . हबीबगंज - इंदौर एसी डबल डेकर एक्सप्रेस ( दैनिक )
10 . हावड़ा - न्यू जलपाईगुड़ी शताब्दी एक्सप्रेस ( माल्दा टाउन के रास्ते सप्ताह में 6 दिन )
11 . कामाख्या - तेजपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस ( दैनिक )
12 . तिरुचिरापल्ली - तिरूनेलवेली इंटरसिटी एक्सप्रेस ( मदुरै विरूद्धनगर के रास्ते दैनिक )
13 . जबलपुर - सिंगरौली इंटरसिटी एक्सप्रेस ( न्यू कटनी जंक्शन के रास्ते - दैनिक )
14 . बीदर - सिकंदराबाद इंटरसिटी एक्सप्रेस ( सप्ताह में छह दिन )
15 . कानपुर - इलाहाबाद इंटरसिटी एक्सप्रेस ( दैनिक )
16 . छपरा - मडुआडीह इंटरसिटी एक्सप्रेस ( फेफना , रसरा मऊ औडिहार के रास्ते दैनिक )
17 . रांची - दुमका इंटरसिटी एक्सप्रेस ( देवघर के रास्ते दैनिक )
18 . बारबील - चक्रधरपुर इंटरसिटी एक्सप्रेस ( डोंगोपासी झिंकपानी के रास्ते दैनिक )
19 . सिकंदराबाद - बेलमपल्ली इंटरसिटी एक्सप्रेस ( काजीपेट के रास्ते दैनिक )
20 . न्यू जल्पाईगुडी - न्यू कूचबिहार इंटरसिटी एक्सप्रेस ( सप्ताह में पांच दिन )
21 . अहमदाबाद - अजमेर इंटरसिटी एक्सप्रेस दैनिक
22 . दादर टर्मिनस - तिरूनेलवेली एक्सप्रेस ( रोहा कोयंबटूर इरोड के रास्ते साप्ताहिक )
23 . विशाखापटटनम - चेन्नै एक्सप्रेस ( साप्ताहिक )
24 . विशाखापटटनम - साईनगर शिरडी एक्सप्रेस ( विजयवाड़ा मनमाड के रास्ते )
25 . इंदौर - यशवंतपुर एक्सप्रेस ( इटारसी , नारखेड़ , अमरावती , अकोला और काचेगुडा के रास्ते साप्ताहिक )
26 . अजमेर - हरिद्वार एक्सप्रेस ( दिल्ली के रास्ते सप्ताह में तीन दिन )
27. अमरावती - पुणे एक्सप्रेस ( अकोला , पूर्णा और लातूर के रास्ते सप्ताह में दो दिन )
28. काचेगुडा - मदुरै एक्सप्रेस ( धर्मावरम , पकाला और जोलारपेटटई के रास्ते साप्ताहिक )
29. बीकानेर - पुरी एक्सप्रेस ( जयपुर , कोटा , कटनी , मुरूवाडा , झारसुगुडा और संभलपुर के रास्ते साप्ताहिक )
30. सिकंदराबाद - दरभंगा एक्सप्रेस ( बल्लाडशाह , झारसुगुडा , राउरकेला , रांची , झाझा के रास्ते सप्ताह में दो दिन )
31. बिलासपुर - पटना एक्सप्रेस ( आसनसोल , झाझा के रास्ते साप्ताहिक )
32. हावड़ा - रक्सौल एक्सप्रेस ( आसनसोल , झाझा और बरौनी के रास्ते सप्ताह में दो दिन )
33. भुवनेश्वर - भवानी पटना लिंक एक्सप्रेस ( विजयानगरम के रास्ते दैनिक )
34. पुरी - यशवंतपुर गरीब रथ एक्सप्रेस ( विशाखापटटनम , गुंटूर के रास्ते साप्ताहिक )
35. साईनगर शिरडी - पंढरपुर एक्सप्रेस ( कुर्दूवाड़ी के रास्ते सप्ताह में तीन दिन )
36. भुवनेश्वर - तिरुपति एक्सप्रेस ( विशाखापट्टनम , गुंटूर के रास्ते साप्ताहिक )
37. विशाखापट्टनम लोकमान्य तिलक टर्मिनस एक्सप्रेस ( टीटलागढ़ , रायपुर के रास्ते साप्ताहिक )
38. हावड़ा - लालकुआं एक्सप्रेस ( मुगलसराय , वाराणसी लखनऊ के रास्ते साप्ताहिक )
39. कोलकाता - जयनगर एक्सप्रेस ( आसनसोल , झाझा और बरौनी के रास्ते साप्ताहिक )
40. डिब्रूगढ़ - कोलकाता एक्सप्रेस ( साप्ताहिक )
41. फिरोजपुर - श्रीगंगानगर एक्सप्रेस (फजील्का अबोहर के रास्ते दैनिक )
42. जयपुर - सिकंदराबाद एक्सप्रेस ( नागदा , भोपाल , नारखेड़ , अमरावती और अकोला के रास्ते साप्ताहिक
43. ओखा - जयपुर एक्सप्रेस ( पालनपुर , अजमेर के रास्ते साप्ताहिक )
44. आदिलाबाद - हजूरसाहिब नांदेड़ एक्सप्रेस ( मुदखेड़ के रास्ते दैनिक )
45. शालीमार - चेन्नै एक्सप्रेस साप्ताहिक
46. मैसूर साईनगर शिरडी एक्सप्रेस ( बेंगलुरु , धर्मावरम बेल्लारी के रास्ते साप्ताहिक )
47. वलसाड़ जोधपुर एक्सप्रेस ( पालनपुर , मारवाड़ के रास्ते साप्ताहिक )
48. पोरबंदर - सिकंदराबाद एक्सप्रेस ( वीरमगाम , वसई रोड के रास्ते साप्ताहिक )
49. बांद्रा टर्मिनस - दिल्ली सराय रोहिल्ला एक्सप्रेस ( पालनपुर , फुलेरा के रास्ते साप्ताहिक )
50. हापा - मडगांव एक्सप्रेस ( वसई रोड , रोहा के रास्ते साप्ताहिक )
5 1 . बैरकपुर - आजमगढ़ एक्सप्रेस ( झाझा , बलिया , मऊ के रास्ते साप्ताहिक )
52 बीकानेर - बांद्रा एक्सप्रेस ( जोधपुर , मारवाड़ , अहमदबाद के रास्ते साप्ताहिक )
53 . अहमदाबाद - गोरखपुर एक्सप्रेस ( पालनपुर , जयपुर , मथुरा , फर्खारुबाद कानपुर के रास्ते साप्ताहिक )
54 . दुर्ग - जगदलपुर एक्सप्रेस ( टीटलागढ़ के रास्ते सप्ताह में तीन दिन )
55 . मन्नारगुड़ी - तिरुपति एक्सप्रेस ( तिरूवारूर , विलुपुरम , कटपडी के रास्ते सप्ताह में तीन दिन )
56. गांधीधाम - बांद्रा एक्सप्रेस ( मोरबी के रास्ते साप्ताहिक )
57. कोटा - हनुमानगढ़ एक्सप्रेस ( जयपुर , देगाना , बीकानेर के रास्ते दैनिक )
58 . झांसी - मुंबई एक्सप्रेस ( ग्वालियर , मक्सी , नागदा के रास्ते साप्ताहिक )
59 . सिकंदराबाद - नागपुर एक्सप्रेस ( काजीपेट के रास्ते सप्ताह में तीन दिन )
60 . कानपुर - अमृतसर एक्सप्रेस ( फर्रुखाबाद , बरेली के रास्ते साप्ताहिक )
61 . छपरा - लखनऊ एक्सप्रेस ( मसरख , थावे , पडरौना के रास्ते सप्ताह में तीन दिन )
62. करीमनगर - तिरुपति एक्सप्रेस ( पेदापल्ली के रास्ते साप्ताहिक )
63. आनंदविहार - हाल्दिया एक्सप्रेस ( मुगलसराय , गोमोह , पुरुलिया के रास्ते साप्ताहिक )
64 इंदौर - रीवा एक्सप्रेस ( बीना के रास्ते सप्ताह में तीन दिन )
65 . 12405-12406 भुसावल हजरत निजामुददीन और 12409-12410 रायगढ़ निजामुद्दीन गोंडवाना एक्सप्रेस को डीलिंक कर जबलपुर - हजरत निजामुद्दीन के बीच स्वतंत्र रूप से गाड़ी का चलाना।
66 . दरभंगा - अजमेर एक्सप्रेस ( रक्सौल , सीतापुर , बरेली , कासगंज और मथुरा के रास्ते साप्ताहिक )
67 . सोलापुर - यशवंतपुर एक्सप्रेस ( गुलबर्गा के रास्ते सप्ताह में तीन दिन )
68 . चेन्नै - पुरी एक्सप्रेस साप्ताहिक
69 . हैदराबाद - अजमेर एक्सप्रेस ( मनमाड , इटारसी , रतलाम के रास्ते साप्ताहिक )
70. आसनसोल - चेन्नै एक्सप्रेस ( पुरुलिया , संभलपुर , विजयानगरम के रास्ते साप्ताहिक )
71 . शालीमार - भुज ( बिलासपुर , कटनी , भोपाल के रास्ते साप्ताहिक )
72. अमृतसर - हुजूर साहेब नांदेड एक्सप्रेस साप्ताहिक
73 . सांत्रागाछी अजमेर एक्सप्रेस ( खड़गपुर , चांडिल , बरकाकाना , कटनी और कोटा के रास्ते साप्ताहिक )
74 .मालदा टाउन - सूरत एक्सप्रेस ( रामपुर हाट , आसनसोल और नागपुर के रास्ते साप्ताहिक )
75. द्वारका - सोमनाथ एक्सप्रेस ( दैनिक )

पढ़ें : रेल बजटः 39 ट्रेनों का रूट बढ़ा, 23 ट्रेनों के फेरे

पैसेंजर ट्रेनें :

1 . गोडरमा - नवाडीह पैसेंजर ( छह दि )
2 . श्रीगंगानगर - सूरतगढ पैसेंजर ( दैनिक )
3. येरागुंटला नोसाम - ननगनपल्ली पैसेंजर ( दैनिक )
4 . विष्णुपुरम - काटपाडी पैसेंजर ( दैनिक )
5. गुनुपुर - पलासा ( परलाखेमुंडी के रास्ते पैसेंजर दैनिक )
6 . अजमेर - पुष्कर पैसेंजर ( पांच दिन )
7 . कोटा - झालावाड सिटी पैसेंजर ( दैनिक )
8 . बरेली कासगंज पैसेंजर ( दैनिक )
9 . आनंदनगर - बाराहानी पैसेंजर ( दैनिक )
10 . रांगिया - तेजपुर पैसेंजर ( दैनिक )
11 . मैसूर - श्रवणबेलगोला पैसेंजर ( दैनिक )
12 . जोधपुर - बिलाडा पैसेंजर ( दैनिक )
13 . विष्णुपुरम - मइलादुतुरई पैसेंजर ( दैनिक )
14 . रोहतक - पानीपत पैसेंजर ( दैनिक )
15 . मिरज - कुर्दुवाडी पैसेंजर ( दैनिक )
16 . फुलेरा - रेवाडी पैसेंजर ( दैनिक )
17 . मैसूर - चामराजनगर पैसेंजर ( दैनिक )
18 . गोरखपुर सिवान पैसेंजर ( कप्तानगंज थावे के रास्ते दैनिक )
19 . 5175151752 रीवा - बिलासपुर पैसेंजर और 51753-51754 रीवा - चिरीमिरी पैसेंजर को डीलिंक करके रीवा बिलासपुर और रीवा चिरीमिरी के बीच स्वतंत्र रूप से पैसेंजर गाड़ियां चलाना।
20 . मैसूर - बिरूर पैसेंजर ( अरसीकेरे के रास्ते दैनिक )
21 . झांसी - टीकमगढ पैसेंजर ( ललितपुर के रास्ते )

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बुधवार, 14 मार्च 2012

ब्लोग्स केर लेल मुप्त डोमेन

मिथिलाक गाम घर :



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मिथिलाक गाम घर 



माँ जानकी केर जनम भूमि मिथिला .  जाही थाम चाकर बनी स्वयं भगवान् शिव संकर उगना रूप धरी आयल छलाह . मुदा ताहि धरती केर आजुक दीन में इ विडंबना अछि जे की अपन अधिकार केर लेल दर दर भटकी रहल अछि मुदा ओकर गुहार सून्निहार कियोक नहीं छैक .


विगत किछु दीन स मिथिला केर पैघ -पैघ मंच पर इ सुनबाक भेटल जे की बिहार सरकार के मैथिलि बीसी पर ध्यान देबाक चाहि आ मास्टर सव केर सेहो बहाल करबाक चाहि .


हम हुनका स आ समस्त मिथिला वासी स कहैक लेल चाहब जे की कखन धरी तक आधा टा सोहारी आ नून खा खा क पेट भरित रहब .


अहि गप में कोनो दू राइ नहीं अछि जे की हमरा सब गोटे केर लेल ई बद्द गर्व केर गप जे की भारत सरकार अहि भाखा केर अष्ठम सूची में मानी ललक , बिहार सरकार ओकरा लागू कैलक मुदा की माँ मैथिलि मात्र एत्बाही टा केर लेल हक़दार अछि ?


कहैक लेल ता सब कियो इ कहैत छि जे की भारते ता क नहीं अपितु सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड केर सभ्यता म स एक टा प्राचीन सभ्यता अछि मिथिला के . तखन मिथिला कियैक आध पेटू भ रहती .


असाम , बंगाल, ओरिसा . आ कतेको एहन राज्य अछि जाहि ठाम मात्र सिक्छा केर भाखा हुनक अपन भाखा छियें . मुदा मिथिला वासी मात्र बिहार सरकार द्वारा एक टा बिषय केर अपनाओल गेल पर कियक नहीं बिरोध करैत छि .


जखन भारत केर आन राज्य में भ सकैत अछि ता मिथिला आ सम्पूर्ण बिहार में एहन कियक नहीं भ सकैत अछि जे की सब टा विषय मैथिलि में होई . मैथिलि केर माध्यम बनेबाक लेल हम सुब हो - हल्ला कियैक नहीं का रहल छि ?


उठू , जागू एखन धरी तक बेसी देर नहीं भेल अछि बिहार सरकार केर बिरोध क ओकरा बता दियू जे की आब हम सब अपन अधिकार नहीं छोराब बसरते हमरा सब केर किछुओ कियक नहीं करे परत .


आबू एक साथ मिल जुली के संक्नाद करी आ बिहार सरकार केर देखा दी जे की तोरा हमर जरूरत छौक नहीं की हमरा तोरा स .

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रविवार, 11 मार्च 2012

गजल


धारक कात रहितो पियासल रहि गेल जिनगी हमर।
मोनक बात मोनहि रहल, दुख सहि गेल जिनगी हमर।

मुस्की हमर घर आस लेने आओत नै आब यौ,
पूरै छै कहाँ आस सबहक, कहि गेल जिनगी हमर।

सीखेलक इ दुनिया किला बचबै केर ढंगो मुदा,
बचबै मे किला अनकरे टा ढहि गेल जिनगी हमर।

पाथर बाट पर छी पडल, हमरा पूछलक नै कियो,
कोनो बन्न नाला जकाँ चुप बहि गेल जिनगी हमर।

जिनगी "ओम" बीतेलकै बीचहि धार औनाइते,
भेंटल नै कछेरो कतौ, बस दहि गेल जिनगी हमर।
(बहरे मुक्तजिब)

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शुक्रवार, 9 मार्च 2012

निर्मोहिया (कथा)


निर्मोहिया (कथा)
हुनकर नाम छल सदानन्द मंडल। माता-पिता हुनका सदन कहैत छलखिन्ह। हुनका नेनपने सँ नाटक-नौटंकी सब मे पार्ट लेबाक शौक छलैन्हि। कनी कऽ कविता शेर सब मे सेहो हुनका मोन लागैत रहैन्हि। ओ अपन उपनाम निर्मोही राखि लेने छलैथ। नाम पूछबा पर अपन नाम सदन निर्मोही बताबैत छलाह। शनैः-शनैः हुनकर नाम निर्मोही जी, निर्मोही आ निर्मोहिया प्रसिद्ध भऽ गेल छलैन्हि। घर-परिवारक लोकक अलावे दोस्त महिम सब हुनका निर्मोही नाम सँ जानऽ लागल छल। हुनकर एकटा बाल सखा छलैथ जिनकर नाम छल घूरन सदा। घूरन सेहो निर्मोही जकाँ नाटक कविताक शौकीन छलाह आ एहि सब मे भाग लैत छलाह। ओ अपन नाम दीवाना राखने छलाह। निर्मोही-दीवानाक जोडी पूरा परोपट्टा मे प्रसिद्ध छल। दुर्गा पूजा मे गाम मे नाटक बिना निर्मोही-दीवाना केर सम्भव नै छल। कोनो आयोजन हुए वा ककरो एहिठाम बरियाती आबै आ की कतौ अष्टजाम होय, सबठाँ निर्मोही आ दीवानाक उपस्थिति परम आवश्यक रहै। निर्मोही-दीवाना गामक लेल नौशाद, खैय्याम, रफी, मुकेश, किशोर आदि सब छलाह। जखने गाम मे कोनो सान्स्कृतिक कार्यक्रम होय की लोक जल्दी सँ जा कऽ अगिला सीट लेबाक कोशिश करैत छल जाहि सँ निर्मोही-दीवानाक नीक जकाँ देख सकल जाइ। कहै केर इ तात्पर्य की निर्मोही आ दीवाना सबहक मनोरंजनक पूर्त्ति करैत छलाह। नाटकक आयोजन मे उद्घोषक जखने कहै की आब निर्मोही दीवाना मन्च पर आबि रहल छथि की तालीक गडगडी सँ पूरा आकाश बडी काल धरि गनगनाईत रहै छल। मन्च पर आबैत देरी दुनू गोटे जनता केँ नमस्कार कऽ कए शुरू करैत छलाह- "हम छी निर्मोही-दीवाना, सब दुख सँ अनजाना, लऽ कए आबि गेल छी, मनोरंजनक खजाना।" आ की लोक ताली बजबय लागै। तकर बाद फिल्मी गाना, पैरोडी, कविता, शाईरी आदि सँ ओ दुनू गोटे पूरा मनोरंजन करैत छलखिन्ह। तहिना गाम मे कोनो बरियाती आबै तऽ इ दुनू गोटे ओहि दरबज्जा पर पहुँचि जाइ छलाह। हुनकर सबहक इ सेवा निशुल्क रहैत छल। कियो भोजन करा दैत छल, तऽ ठीक, नै तऽ कोनो बात नै। हिनकर सबहक कोनो माँग नै छलैन्हि। नेनपने सँ हमरा मोन मे हिनका सबहक प्रति बड्ड आदर छल। हिनकर सबहक निस्वार्थ सेवा देखि हमरा सदिखन यैह लागल जे इ सब सही मे साधु छथि। हिनका सबहक परिवारक खर्चा कहुना कऽ चलैत छल। कखनो माता-पिताक हुथनाइ आ कखनो कनियाँक बात कथा। मुदा हिनका सब पर कोनो असर नै छल। साँझ होइत देरी दुनू मुखियाजीक पोखरिक भिंडा पर आबि जाइत छलाह, जतय पहिने सँ छौंडा आ जुआन सब हिनकर सबहक प्रतीक्षा मे बैसल रहैत छलाह। तकर बाद शुरू भऽ जाइत छल मुशायरा इ शायर-द्वय केर।

समयक गाडी तेजी सँ भागैत रहल। हम पढि कऽ किरानीक नौकरी करऽ लागलौं। गाम एनाई कम भऽ गेल। शुरु मे तऽ नियम बना कऽ होली, दुर्गा पूजा, छठि मे आबैत रहलौं। बाद मे इहो एनाई जेनाई बड्ड कम भऽ गेल। गाम मे धीरे धीरे सब किछ बदलि गेल। नाटकक चलन सेहो खतम भेल जाईत छल। ओकर बदला मे थेटर आ बाईजीक चलन बढल जाईत छल। बरियातीक स्वागत सत्कार मे अपनैतीक स्थान पर यान्त्रीकरण जकाँ बेबहार हुए लागल छल। निर्मोही आ दीवानाक पूछनिहारक संख्या सेहो घटल जाईत छल। घूरन सदा अपन परिवारक दारूण स्थिति देखि नौकरीक जोगाड मे लागि गेलाह आ कहुना कऽ एकटा प्राइवेट प्रेस मे दरिभंगा मे नौकरी करऽ लागलाह। ओ अपन बाल सखा सदानन्द मंडल उर्फ सदन निर्मोही केँ सेहो लऽ जेबाक प्रयास केलखिन्ह, मुदा निर्मोही नहि गेलथि। निर्मोहीक स्थिति आरो खराप भेल गेल आ तमाकूलक खर्ची तक निकलनाई भारी हुअ लागल। मुदा निर्मोही अपन कविता शाईरीक शौक नै छोडलैन्हि। एक बेर दुर्गा पूजा मे गाम एलहुँ। साँझ मे मेला घूमै लेल गेलौं। पता चलल जे एहि बेर एकटा पैघ थेटर आयल अछि। हम कक्का सँ निर्मोहीजी दिया पूछलियैन्हि। कक्का कहलथि जे ओ बताह भऽ गेल छथि। कतौ कोनटा मे ठाढ भऽ कऽ अपन बडबडाईत हेताह। हम चारू कात ताकऽ लागलौं। देखलौं जे मेलाक एकटा अन्हार कोन मे ओ वीर रसक कविता पूरा जोश मे पाठ करैत छलाह आ बच्चा सब हुनकर चारू कात घेरा बना कऽ ताली बजबैत छल। हम लग गेलौं। निर्मोहीजीक दाढी पूरा बढल छल। आँखि मे काँची, उजडल केश, फाटल कुरता.... हमर मोन करूणा सँ भरि गेल। हम गोर लागलियैन्हि आ पूछलियैन्हि- "कक्का चिन्हलौं?" ओ हमरा धेआन सँ देखि बजलाह- "अहाँ ओम थीकौं ने।" हम- "अहाँ अपन की हाल बना लेने छी। काकी आ बच्चा सबहक की हाल?" निर्मोही- "यौ सब कहुना कऽ जीबि रहल छै। खेनाईक जोगाड कहुना भऽ जाईत अछि।" हम- "कविता शाईरीक की हाल?" निर्मोही- "कियो पूछनिहार तऽ रहल नै। बस अपने रचना करैत छी आ नित्य साँझ मे पोखरिक भिंडा पर जा कऽ असगरे पाठ करैत छी। लोक बताह कहैत ए। सब बुडिबक छथि। साहित्य आ रचनाक महत्व की बूझताह।" हम- "कोनो नौकरी नै केलियै अहाँ?" निर्मोही- "हमर जन्म नौकरी करबा लेल नै भेल अछि। हम अपन जिनगी गीत-संगीत आ शाईरीक नाम लिख देने छी।" हम- "इ तऽ ठीक अछि। मुदा काकी आ बच्चा सभक तऽ सोचियौ।" निर्मोही- "अरे सभक देखनिहार भगवान छथि। भगवान सभक जोगाड करथिन्ह।" हमरा रहल नै गेल आ हम किछ आर्थिक मदति करबाक कोशिश केलौं, मुदा ओ लेबा सँ मनाही कऽ देलथि। कहलथि- "अहाँक चाह पीबि लेलौं, बस वैह बहुत अछि। हमरा कोनो मदति नै चाही।" हम हुनका सँ अनुमति लऽ कऽ मेला सँ गाम दिस चललहुँ। सोचऽ लागलहुँ जे इ कोन बतहपनी भेल। परिवारक विषय मे नै सोचबाक छलैन्हि तऽ बियाह किया केलाह निर्मोही जी। फेर इहो सोचऽ लागलौं की समाजक लोक मनोरंजन तऽ चाहै छथि, मुदा मनोरंजन पर पाई नै खर्च करऽ चाहै छथि, से किया। नीक सँ नीक कलाकार जँ अपन कोनो रोजगार नै करै तऽ भूखले मरि जाईत ए। समाज एहन निर्मोही कियाक अछि। जे कहियो सबहक तालीक केन्द्र रहैत छलाह, से आब सब केँ बताह किया बूझा रहल छथिन्ह। यैह सब सोचैत हम निर्मोहीजीक आंगन पहुँचि गेलौं। आंगन मे हुनकर कनियाँ बैसि कऽ तरकारी काटै छलीह। हम गोर लागैत कहलियैन्हि- "काकी की हाल चाल?" ओ फाटल आँचर सँ अपन माथ झाँपैत कहलथि- "कहुना कऽ जीबि रहल छी बउआ। तेहेन निर्मोही सँ बाबू बियाह करा देलथि, जिनका पर-परिवारक कोनो मोह नै छैन्हि।" हम- "काकी, कक्का तऽ साहित्य संगीत मे लागल छथि। हुनका एना निर्मोही जूनि कहू।" काकी- "जँ एहन गप अछि तँ साहित्ये संगीत सँ बियाह किया नै कऽ लेलथि? दू टा बेटा जुआन भऽ कऽ कतौ पलदारी करैत छैन्हि। बेटी केँ बियाहक कोनो चिन्ता नहि। एहन कोन साहित्य प्रेम? हमर ससुर बीमार भऽ कऽ दवाईक अभाव मे तडपि तडपि कऽ मरि गेलाह। हुनकर मरलाक बाद ओ केश आ दाढियो नै कटेलथि। इ कोन बतहपनी भेलै?" हम ओतय सँ चलि देलहुँ। सोचऽ लागलौं जे सब लेल ओ निर्मोही आ हुनका लेल सब निर्मोही।

समयक पहिया घूमैत रहल। १० बरख बीत गेल। गरमी छुट्टी मे बच्चा सब केँ लऽ कऽ गाम आयल छलहुँ। एक दिन दलान पर बैसल छलहुँ की रमन भाई कहैत अयलाह- "निर्मोही गोल भऽ गेलाह। किछ दिन सँ बिछौन धेने छलाह। कोनो गम्भीर रोग सँ पीडित भऽ गेल छलाह।" हम रमन भाईक संग निर्मोही जीक दलान पर गेलौं। ओतुक्का दृश्य बड्ड कारूणिक छल। काकी उठा उठा देह पटकै छलीह आ कानैत छलीह इ बाजि बाजि जे जिनगी भरि निर्मोहिया रहलौं आ आइयो निर्मोहिया बनि उडि गेलौं। हम आंगन मे पडल लहाश केँ देखलहुँ। बाँसक चचरी पर सदानन्द मंडल उर्फ सदन निर्मोही उर्फ निर्मोहिया शांति सँ पडल छलथि। एकदम शांत, बिना कोनो मोह केँ दीर्घ विश्राम मे छलाह निर्मोही जी। पूरा गाम ओतय जुटल छल आ निर्मोहीक संगीत कविताक चर्चा करैत छल। हम दलानक कोठरी मे गेलहुँ जतय निर्मोही रहै छलाह। एकटा टूटलाहा काठक अलमीरा मे हुनक हाथ सँ लिखल ढेरी पाण्डुलिपि पडल छल। किछ दीमक सँ खाएल छल आ किछ कागतक सियाही पसरि गेल छलै। हुनकर सिरमा तर मे एकटा कागत छल जै पर किछ लिखल छल। इ हुनकर अन्तिम रचना छल, जे पूरा नै छल। ऐ मे लिखल छलः-
इ जग छै निर्मोही, बन्धन तोडि कऽ उडि जाउ।
आब नै घूमू, कियो कतबो कहै जे घुरि जाउ।.............................................................................

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निबंध प्रतियोगिता


निबंध प्रतियोगिता


दिल्ली सँ प्रकाशित मासिक मैथिलि पत्रिका मिथिलांचल पत्रिका के द्वारा कक्षा ८ सँ ल के बी.ए/बी.एस.सी/ बी.कॉम/इंजीनियरिंग /चिकित्सा विज्ञानं के छात्र हेतु एकटा निबंध प्रतियोगिता रखल गेल अछि .
निबंध के विषय :- "मातृभाषाक माध्यम सँ विज्ञानं एवं प्रोद्योगिकी के शिक्षा कतेक सार्थक अछि "
जाही में प्रतिभागी हेतु नियम :-
१. कक्षा ९ सँ - स्नातक तक के छात्र भाग लय सकैत छथि
२. उम्र सीमा - १२ वर्ष -२२ वर्ष
३.रचना मौलिक हेबाक चाही एवं स्व लिखित हेबाक चाही
४.आलेख मैथिलि भाषा में हेबाक चाही
५.रचना पठेबक अंतिम तिथि - २५ मार्च २०१२
६. प्रतिभागी लोकनि अप्पन आलेख mithilanchalpatrika@gmail.com
या B-2/333 Tara Nagar, Old Palam Road Sec-15 Dwarka New Delhi-110078. पर पठाबी
७. आलेखक संग अप्पन परिचय एवं पत्राचारक पता अबश्य पठाबी
८. विशेष जानकारी हेतु संपर्क करी Mob -9990065181  /  9312460150  / 09762126759.

निर्णयाक मण्डली में छैथि :- १.डॉ. कैलाश कुमार मिश्र २.डॉ. प्रेम मोहन मिश्र ३. श्री गजेन्द्र ठाकुर ४. डॉ. शशिधर कुमार
पुरस्कार :- निबंध प्रतियोगिता में चयनित प्रतिभागी के समुचित पुरस्कार राशी एवं प्रमाणपत्र पठौल जाएत

भबदीय
डॉ. किशन कारीगर
(संपादक ) मिथिलांचल पत्रिका

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रविवार, 4 मार्च 2012

गजल ३४

हिनका पेट ढुकैत कियै नै किछु आगि आकि पानि छै
बाभन-सोल्हकन द्वेष किछु सरिपहुँ किछु ठानि छै

मुँह देखि मुंगुआ परसैक छै पुरनके व्यवहार
कतहुँ भाय-भतार, कतहुँ सेज पर देल बाणि छै

अपहरण-बालात्कार सँ तँ छहियै सभ डेराओल
बलत्कारी थोरै बुझै मौगी-देह बाभनि कि मियानि छै

बुड़िबक जकाँ कियै मारै छियै एहि अबला बूढ़ी केँ
मोन अस्सक अहाँक, कहै छी हिनका हक्कल-डानि छै

खढ़ खौटि आगि सेदै मे लागि रहल छैन्हि रसगर
अगिलुत्तिक झड़कल घा केर एक्कोरत्ती नै ग्लानि छै

राज करै फ़ोड़ूक नीति छै उपनिवेशक जनमल
अपन देस लोकतंत्रो केँ ठेघने इयह धरानि छै

"शांतिलक्ष्मी"क विस्वास तँ ऊँच-ओछ सँ छै बड़ ऊपर
हमर लिंग-जाति सँ अपनेक मोन कियै बिषानि छै

......वर्ण २०........

रचना:-
शंतिलाक्ष्मी चौधरी


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gazal @prabhat ray bhatt

शनिवार, 3 मार्च 2012

gazal @prabhat ray bhatt

गजल:- होली
रंग विरंगक रसरंग सं भौजी के रंगाएल चोली
रंग उडैए छै अवीर उडैए छै देखू आएल होली

होली के रंग में रंगाएल सभक एकही रूपरंग
दोस्ती के रंग में रंगाएल दुश्मन देखू आएल होली

प्रेम स्नेहक पावैन होली गाबैए गीत फगुआ टोली
रसरंग सरोवर भेल दुनिया देखू आएल होली

रंग में रंगाएल शरीर गाबैए गीत जोगी फकीर
गाबैए जोगीरा बजाबैए मृदंग देखू आएल होली

रंग उड़ाबैए रंगरसिया कियो उड़ाबैए अवीर
तन मोन सभक रंगाएल देखू आएल होली

......................वर्ण-२०.............
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

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शनिवार, 3 मार्च 2012

मैथिली - मिथिला - मैथिल!



 मैथिली - मिथिला - मैथिल! 



नाम हमर छी मैथिल भैया, मिथिला हमर गाम यौ,
मैथिली भाषी हम सभ सगरो पसरल जग ओ जहान यौ!

एहि धरतीके पावन केलीह जगज्जननी सिया जानकी
जनक समान विदेहराज केँ पाहुन बनलैथ रामजी!
पुण्य भूमि मिथिलामें अयलाह एक पर एक विद्वान्‌ यौ,
मैथिली भाषी हम सभ सगरो, ...
नाम हमर छी मैथिल भैया, ...

कवि विद्यापति जन्म लेलनि रचैत साहित्यिक नव आइना
आनक देक्सी छोड़ू यौ जनगण गाबू निज देसिल वयना
एहि धरतीपर जन्म लेलनि जे जगके देखावथि राह यौ!
मैथिली भाषी हम सभ सगरो...
नाम हमर छी मैथिल भैया...

यैह थीक मिथिला जेकर बीज सँ राजनीति के ज्ञान बनल
लोहिया जेपी कर्पूरी ओ सूरज मिथिला दीपक शान बनल
देव-पितर-ऋषि-मुनिजन ज्ञानी कयलनि जग कल्याण यौ!
मैथिली भाषी हम सभ सगरो...
नाम हमर छी मैथिल भैया...

दिव्य संपदा केवल वाञ्छित नहि चाही जगछूल ढौआ
त्याग समर्पण नींब बनल वैह बेटा बनैछ कहैछ बौआ
आइ स्वार्थ में डूबि छै ढहल मिथिला किला महान यौ
मैथिली भाषी हम सभ सगरो...
नाम हमर छी मैथिल भैया...




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गीत:-
टुईट नै सकैय विधना के विधानक लकीर
बदैल नै सकैय कियो अप्पन तक़दीर //२

पंचतत्व रचित इ अधम शरीर
घाऊ अछि सभक मोन में गंभीर
सुख के खोज में दुनिया लागल
राजा रंक जोगी फकीर .............
हो भैया, राजा रंक जोगी फकीर
टुईट नै सकैय विधना के विधानक लकीर//
बदैल नै सकैय कियो अप्पन तक़दीर //२

सुख नहि हुनका भेटल जग में
जे दुःख सं मुह मोड़ी पड़ाएल

जराबू मोन में जीवन दर्शन ज्योति
दुःख क सागरमे भेटै छैक
सुख स्वरुप अपार हिरामोती
टुईट नै सकैय विधना के विधानक लकीर//
बदैल नै सकैय कियो अप्पन तक़दीर //२

भाग्य सं बढ़ी के जगमे किछु नहीं बलवान
पल में राजा रंक भेल विप्र बनल धनवान
राजपाठ सभ त्यागी भेल राम लखन वनवासी
बिक गेल राजा हरिश्चंद्र बनल डोमक दासी
हो भैया,राजा हरिश्चंद्र बनल डोमक दासी
टुईट नै सकैय विधना के विधानक लकीर //
बदैल नै सकैय कियो अप्पन तक़दीर //२

जीवन एक संघर्ष दुःख छै महा संग्राम
कांटक डगैर चलैत रहू लिय नै विश्राम
दुःख क संघर्ष सं भेटैय छै सुख आराम
दुःख सुख छै जीवन,जिनगी एकरे नाम
हो भैया,जिनगी एकरे नाम ..............
टुईट नै सकैय विधना के विधानक लकीर //
बदैल नै सकैय कियो अप्पन तक़दीर //२
रचनाकार:-प्रभात राय भट्ट

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शुक्रवार, 2 मार्च 2012


शिवताण्डवस्तोत्रम् ।

अनुवाद :-डा0 चन्द्रमणि. 
जटारूप अटवी वन निकसलि जाह्नवीक पावन धारा
गरदनि अवलम्बित फणिमाला ताण्डव नृत्य प्रचण्ड परा,
डिमिक डिमिक डिम डमरु बाजे स्वर लहरी अनुगुंज करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।1।
जटा कड़ाही मध्य तरंगित गंग सुशोभित शीश जनिक,
धह-धह ज्वाल ललाटक मध्ये राजित बालक शोम तनिक,
शुचि शरीर सुन्दर शशि शेखर सदा हृदय अनुराग भरे
करु कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।2।
धन-धन गिरि तनया विलास निर्लिप्त निरासक्ते योगी,
हुलसित लखि चहुँदिशि प्रकाश निज शिर-भूषण जन-उपयोगी,
सतत् कृपा दृग पाबि दिगम्बर कष्ट हरे आमोद भरे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे-हरे ।3।
जटाजूट आवर्तित फणि-मणि कुंकुम रागालेप प्रभा,
आलोकित चहुँ दिशा हस्ति चर्माम्बर पहिरन हरक सदा,
ताहि विलक्षण भूतनाथ मे मन विनोद सदिकाल करे,
करू कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।4।
इन्द्रादिक मस्तक आवर्तित पुष्प पराग चरण-पनही,
नागराज केर हार निबद्धित जटा शिखर शशि टा धनही,
चिर संपत्ति घटय नहि कहियो रिक्त हमर भंडार भरे,
करु कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे-हरे ।5।
अग्नि प्रज्वलित भालक वेदी मन्मथ शमन तेज सं भेल,
भाल विशाल कलाधर शोभित छथि आराध्य इन्द्रहुक लेल,
मस्तक महाजटिल शिवशंभुक मम अभिष्ट श्री सिद्ध करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।6।
धह धह अनल भाल विकराले कयल कामदेवहुक हवन,
गिरितनया-कुच पत्रभंग रचना कारीगर शिवा रमण,
अटल भक्ति एकाग्रचित्त हो तीन नयन मे ध्यान धरे,
करू कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।7।
अमारात्रि केर नवल मेघमाला सन कारी कण्ठ जनिक,
हस्तिचर्म धारक तारक विश्वेश गंगपति चन्द्रमणिक,
परम मनोहर कान्तिवान भगवान धनक विस्तार करे,
करू कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।8।
नील कमल दल श्याम प्रभा अनुगमना हरिणी-छवि ग्रीवा,
त्रिपुर काम भव दक्ष यक्ष हरि अन्धक यम हति देव-शिवा,
विघ्न विनाशक पिता महादेव सकल ताप परिताप हरे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।9।
दंभ रहित गिरिजाक मधुप जे कला कदम्ब मंजरी पान,
दक्ष यक्ष हरि यम भव अन्तक मन्मथ त्रिपुर असुर अवशान,
महादेव मम कष्ट विनाशक दिवा राति मन भजन करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।10।
सिर भुजंग फुफकार वेग सं अनल ललाट धधकि रहलइ,
शिव प्रचणड ताण्डव आलोकित धिमि धिमि नाद धमकि रहलइ,
गुंजित मंगल घोष चहुँदिशि मंगल मंगल सदा करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।11।
पाथरवत् पुनि कोमल सेजे साँप आर मुक्ता माला,
रत्न माँटि मित शत्रु अभेदे दुर्वादल अक्षी-कमला,
प्रजा आर पृथ्वीपति में समभाव राखि मन जपन करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे।12।
ललित ललाट भाल चन्दा मे सदिखन स्थिर चित्त रहय,
सुरसरि तट करजोरि भाव निर्मल मन शिव केँ जाप करय,
सजल नेत्र शिव चरण कमल मे पल पल छिन छिन नमन करे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।13।
अति उत्तम स्तोत्रक वर्णन पाठ नित्य स्मरण करय,
शिवगुरू भक्ति मिलय तहि जन केँ नहि विलोम गति लेश रहय,
गिरिजापति पद भक्ति अहर्निश भवबंधन सं मुक्त करे,
करू कल्याण हमर शिव शंकर जयशिव जयशिव हरे हरे ।14।
इति पूजा संध्याकाले दसकंधर पठितक पाठ करे,
से नर गज रथ सुत धन पावे सदा सुखी संतान रहे,
अटल भक्ति सं अचल संपदा आशुतोष धन धान्य भरे,
करू कल्याण हमर शिवशंकर जयशिव जयशिव जयशिव हरे हरे ।15। 
अनुवादक: डा0 चन्द्रमणि.

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गजल


करेज घँसै सँ साजक राग निखरै छै।
बिना धुनने तुरक नै ताग निखरै छै।

अहाँ मस्त अपने मे आन धिपल दुख सँ,
जँ लोकक दर्द बाँटब, लाग निखरै छै।

इ दुनिया मेहनतिक गुलाम छै सदिखन,
बहै घाम जखन, सुतल भाग निखरै छै।

हक बढै केर छै सबहक, इ नै छीनू,
बढत सब गाछ, तखने बाग निखरै छै।

कटऽ दियौ "ओम"क मुडी आब दुनिया ले,
जँ गाम बचै झुकै सँ, तँ पाग निखरै छै।
(बहरे-हजज)

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गुरुवार, 1 मार्च 2012

चाय के चुस्की मुस्की के संग – अजय ठाकुर (मोहन जी)


विजय जी और रंजना के प्रेम बिवाह किछु माह पहीले भेल अछि ! दुरागमन सेहो संगे भऽ गेल किछु दिन के बाद विजय जिक कनियाँ रंजना कहलखिन, हमरा बिवाह के दु माश भ गेल और अखन तक आहा हमरा कतो घुमाव नहीं ल गेलो हन्!  
विजय जी किछु देर चुप रहला और फेर बजला हे हमरा जावेत धरी माँ और बाबुजी नहीं कहता तावेत तक हम आहा के कतो घुमाव नहीं ल जायब बुझलो ! रंजना के मोन कने उदाश भ गेल फेर दुनो गोटे अपन अपन कॉज में लागी गेला ! विजय जी फेर रंजना के समझा क ओ अपन बाबु जिक पास गेला और कहलखिन जे रंजना के इच्छा भ रहल छै जे कतो घुमे लेल जय के से जओ आहा के आज्ञा होय त हम दुनो गोटे घुमी आबि ! बाबु जी हाँ कही देलखिन !

विजय जी और रंजना यात्रा केरी तयारी शुरू क देला ! दुनो प्राणी माँ बाबुजी के आशीर्वाद लेलाह और घर सऽ निकैल गेला ! सकरी टीसन पर जा क टिकट कटेला ताबैत धरी शहीद एक्सप्रेस सेहो टीसन पर आबि गेल दुनो गोटे गाड़ी पर जाकऽ बैसी गेला ! आब गाड़ी के ड्राईवर बाबु सेहो पुक्की मारला पु....पु..पुपुपुपुपुपू....छु..क.. छुक..छुकछुक  छुक..., गाड़ी आगू बढ़ऽ लागल !

गाड़ी जहान पांच-छः टीसन आगा बरहल ताहि के बाद एकर लेन किलयर नहीं छल ताहि लक् गाड़ी के २-३ घंटा रोकी देलक ! ताबैत में ओमहर सऽ चाय वला गर्म चाय-गर्म चाय कहैत आयल रंजना अपन स्वामी के कहैत छथि एक कॉप चाह पीबी लिय आहा भोर में सेहो नहीं पिलो आब विजय जी दु कॉप चाह के पाई देलखिन और दुनो गोटे पिबऽ लगला ! रंजना दु घुट पीब क खिड़की स बाहर फेक देलक, विजय जी पुछलखिन कि भेल ? रंजना कहलखिन चाह में स्वाद नहीं लगाल !
विजय जी कहलखिन ठीक छै गाड़ी लेट या चलू उतरी क कोनो दोकान पर चाह पीबी लई छी, दरभँगा में ओनाहू जान-पहचान के बहुत दोकानदार अछि ! विजय जी और रंजना दोनों गोटे गाड़ी स उतरी क दोकान दिश बढला ! एक दोकान पर जा क दु टा चाह और दु टा सिंघारा के आर्डर देलखिन ! थोरबे देर में चाह और सिंघारा लक् आबि ग्लेन दुनो गोटे सिंघारा पावऽ लगला और चाह सऽ ठोड़ पकावऽ लगला ! रंजना चाह पीबी कने मुस्किया देलखिन आब दुनो गोटे अपना आप में टकटकी लगा क देखऽ लगला और बिशैर गेलखिन कि हमरा गाड़ी पकरबाक अछि!

लगभग आधा घंटा के बाद दोकानदार अपन कप लै आयल त देख क कह: लागल अऊ जी महराज लिय चाय के चुस्की मुस्की के संग, मगर हमर कप त छोरी दिय औरो ग्राहक चाय के लेल ठाढ या ! ई बात सुनी क रंजना और विजय के मोन लज्जा गेलैन और ओत् स परेलो बाट नहीं सुझलैन ! और ओ जे टीसन पर अयला त देखैत छथि जे ओ गाड़ी फुजी गेल छल आब दुनो गोटे अपना घर आबि गेला ! माँ और बाबुजी पुछलखिन कि आहा दुनो गेलिये नहीं, विजय जी बजला बाबुजी गाड़ी हमर छुइट गेल त हम दुनो गोटे सोचलो कि बाद में कहियो चली जायब ! बाबुजी बजला अत्ति उत्तम जे विचार हुये से करू !


रचनाकार :- अजय ठाकुर (मोहन जी)

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