बुधवार, 8 फ़रवरी 2012

माय छी कल्याणकारिणी छी !

हम नारी छी
माय छी कल्याणकारिणी छी
हम नारी छी
हमर सम्मान करे, नव वस्तु समान व्यवहार करे
समाज हमरहि सऽ अछि तैयो समाज हमर रहब सऽ प्रसन्न नहि
समाजकेर कूरीतिसँ आइयो दहेजक प्रथा जे हंटि नहि रहल
आखिर किऐक एकर विरुद्ध अभियान चलाबयवाला कम अछि
किऐक तऽ धन-दौलतपर मरयवाला कम नहि अछि!
आखिर किऐक एकरा रोकय लेल बढल हाथकेँ बेसी हाथ नहि भेटैछ
किऐक तऽ आइ आदमी चेहरा पर एतेक चेहरा लगेने अछि जे स्वयं अपन चेहरा नहि देखि पबैछ
रोइक दे बेटीके पैसा सऽ तौलनाइ
जुइन सोचे के बदलल आ केकरा छैक बदलनाइ
बेटियो के आइ मजबूत बनाबय पड़तैक
दहेज सँ जुड़ैत बियाह सऽ मुँह मोड़य पड़तैक
आजुक समाजमें एहि दाकियानूसी सोच लेल जगह नहि
जतय बेटी के पढाके सेहो बाप पैसा दियय एहेन सोच कोनो सोच नहि!

रचना:-
चन्दन झा "राधे"

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