सोमवार, 2 जनवरी 2012

गज़ल - अजय ठाकुर (मोहन जी)



मुश्किल स भरल या रस्ता देखु, 
समय स दुश्मनी के अशर देखु
हुनका याद में राईत भैर जगलो हम,
सुतल छथि ओ घर में बेखबर देखु
दर्द पलक के निचा उभैर रहलैन, 
नदी में उठल कने लहर त देखु
के जाने छथि कैल रही या नै रही,
आए छी त कने हम्हरो दिश देखु
होश के बात करेत छलो उम्र भरी, 
"मोहन जी" बेहोश छथि एक नैजैर देखु

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