रविवार, 22 जनवरी 2012

मिथिला भाषा रामायण, सुन्दरकाण्ड प्रथम अध्य.

कविवर चंदा झा वि रचित मिथिला भाषा रामायण, सुन्दरकाण्ड प्रथम अध्य.

चौपाइ
जयजय राम नवल-घनश्याम । सकललोक-लोचन
अभिराम ॥
मनमे तनिक ध्यान दृढ राखि । मारुतनन्दन
उड़ला भाखि ।।
शतयोजन वारिधि विस्तार । लाँघब हम मन
हर्ष अपार ।।
रघुनायक-कर जनु शर मुक्त । तथा हमहुँ जायब
मुदयुक्त ।।
देखथु कपिगण जाइत गगन । शोभित जेहन प्रवहमे
भगण ।।
वैदेही हम देखब आज । दोसर यहन आन की काज ।।
रघुनन्दन काँ(केँ) वार्ता कहब । सत्वर घुरब अनत
नहि रहब ।।
नामस्मरण अन्त एक बार । जनिकाँ भव-
जलनिधि से पार ।।
प्रभुक मुद्रिका हमरा संग । होयत न हमर
मनोरथ भंग ।।
जायब लंका दनुज-समाज । प्रभुप्रताप साधब सब
काज ।।

सोरठा

उड़ि चलला हनुमान , ध्यान राम पदमे सतत ।।
प्रबल प्रलय पवमान , रौद्र-मूर्ति लंकाभिमुख।।
जखन हनुमानजी सीता माएकेँ खोजए लेल
समुद्र पार जाएकेँ तैयारीमे छथि , ताहि कालक
हुनक हर्षक अभिव्यक्ति अछि ।

चौपाइ
लंका जाइत छथि हनुमान । की बल की मति से के
जान ।।
सुरसा काँ सुर सत्वर कहल । सर्प्प-जननि करू
सुरहित टहल ।।
बहुत दिवस धरि मानब गुन । जाउ शीघ्र
घुरि आयब पून ।।
रोकब बाट कहब नहि मर्म्म । बूझब की करइत
छथि कर्म्म ।।
कहल कयल से नभ पथ रोकि । चललहुँ कतय ततय देल टोकि ।।
हमरा आनन सत्वर आउ । विहित भक्ष्य अन्यत्र न
जाउ ।।
प्रस्तुत पाँतिक प्रसंग अछि ,
हनुमानजी लंका जाइत काल देवता सभ
द्वारा हुनक वुद्धि ओ बलक परीक्षण हेतु सर्प
माता सुरसाकेँ पठायल जाइत अछि ।
सवैया-छन्द

मारुत-सुत कहलनि शुनु माता ।, राम-काज कय
आयब घूरि ।
सीता-विषय कहब श्री प्रभुकाँ अहँक देब
प्रत्याशा पूरि ।।
सुरसा देवि होइ अछि अरसा , कल जोड़ैछी छोड़ू
बाट ।
अभिन मारूति कहल न मानल , नमस्कार कय भेलहुँ
आँट ।।
सुरसा कहल शून रे बाबू , नहि छोड़ब बिनु खयलैँ ।
एखनहुँ धरि जीवन-प्रत्याशा , हमरा मूँहमे आयलैँ।।
बहुत दिन सौँ मह भूखलि छी , बिनु आहारैँ मरबे ।
हाथक मुसरी बियरि मे दय कड़े कड़े नहि करबे ।।

सर्प माताकेँ बाट रोकला पर हनुमान जी अनुनय
विनय करैत छथि , मुदा सुरसा अपन भूखक बात
कहि बात नहि मानैत छथि ।
चौपाइ
मारुति कहल देवि मुह बाउ । खाय शकी तँ
हमरा खाउ ।।
योजन भरि विस्तार कर काय । सुरसा मुह दश
कोश बनाय ।।
तकर द्विगुण हनुमानो कयल । बिश योजन मुख
सुरसा धयल ।।
योजन तीस वदन हनुमान । योजन पचाश प्रमान।।
अति लघु बनि मुह बाहर जाय । नमस्कार
हँसि कहल शुनाय ।।
बहरयलहुँ देवि आनन पैसि । हम जाइत छी रहब न
बैसि ।।

दोहा

सुरसा संतुष्टा कहल , सत्वर लंका जाय ।
राम-कार्य्य साधन करू , हम छी सर्पक माय ।।
देव पठावल बुझल बल , सीता देखू जाय ।
कुशल फिरब सीता-कुशल , रघुवर देब शुनाय ।।
तखन चलल हनुमान पुन , गरुड़-गमन आकाश ।
जलधि तहाँ मैनाक सौँ कयलनि वचन प्रकाश ।।

जखन सुरसा नहि मानलि तँ हनुमानजी अपन
शरीरके विशाल कय हुनका मुह खोलैय लेल कहलैन ।
जखन सुरसाकेँ मूह बड़ नमहर भए गेल तखन
हनुमानजी लघु रूप धारण कय माता सुरसाकेँ मुहमे
जाय बहरा गेल आओर सर्प माताकेँ संतुष्ट कए
देला । एहि उपरान सुरसा अपन परिचाय दैत
हनुमानजी केँ राम काजक सफलता हेतु जाए लेल
कहैत छथि ।

आगू बाटमे हनुमानजी केँ मैनाक पर्वत सँ
वार्तालाप होइत अछि ।
चौपाइ

कयल सगर-कुल बड़ उपकार । तनिक बढ़ायोल भेलहुँ
अपार ।।
तनिकहि वंश राम अवतार । हुनक दूत जाइत
छथि पार ।।
जलनिधि कहल जहन हित वाक । जलसौँ उच्च
भेला मैनाक ।।
काञ्चन-मणि-मय श्रृंग अनूप । ततय पुरूष एक
दिव्य स्वरूप ।।
हे कपि हमर नाम मैनाक । जलधि भितर डर मन
मधवा क ।।
मारूत-नन्दन करु विश्राम । खाउ अमृत सन फल
एहिठाम ।।
पथ विशराम न भोजन आज । अछि कर्त्तव्य राम-
प्रिय काज ।।
शिखरक परश हाथ सौँ कयल । गगन-मार्ग
पक्षी जकाँ धयल ।।

दोहा

धयलक छाया-ग्राहणी , कयलक गमनक रोध ।
हनुमानक मनमे तखन , बाढल अतिशय क्रोध ।।
घोरस्वरूपा सिंहिका , छाया धय धय खाय ।
नभचरकाँ ओ राक्षसी , गगन-गमन जे जाय ।।
देखल तनिकाँ मारुतसुत , मारल झट दय लात ।
पुन उड़ि के चललाह से शान्ति भेल उतपात ।।

सागर पर सगर कुलक उपकार छल , ताहि द्वारे
सागर मैनाक पर्वत केँ राम दूत हनुमानक
विश्राम व भोजन लेल पठाउल जाइत अछि ,
कियाक तँ श्रीराम सगर कुलक छलाह ।
मुदा हनुमानजी रामकाज सँ पहिने भोजन व
विश्राम नहि करय चाहैत छथि आ मैनाक पर्वत
केँ स्पर्श करैत आगू बढि जाइत छथि ।

आँगा बामे एकटा राक्षसी सँ भेंट होयछन्हि , जे
आकाशमे उड़ैत जीवक छाया पकड़ि केँ खा लइत
अछि । हनुमानजी ओही छाया ग्राहणी केँ मारैत
रामकाज लेल बढैत छथि ।
हरिपद
पादाकुल दोहा

गिरि त्रिकूटपर लंकानगरी नाना तरु फल बेश ।
नाना खग मृग गण सौ शोभित पुष्पलतावृत देश ।।
दुर्ग्ग दुर्ग्ग मे रोकत टोकत चिन्तित-मन
हनुमान ।
करब प्रवेश राति कय तहि पुर
दिवा युक्ति नहि आन ।।

हनुमानजी लंका प्रवेश कऽ गेल छथि आ ओहि ठामक
प्राकृतिक सौंदर्य देखि चकित छथि । लँकाक
सुरक्षा व्यवस्था देखि हनुमानजी नगरमे प्रवेश
हेतु रातिक समय चुनैत छथि ।

चौपाइ

राम-चरण-सरसिज कय ध्यान । सूक्ष्मरूप
भेला हनुमान ।।
पुरी प्रवेश कयल निशि जखन । बुझलक
लंका नगरी तखन ।।
कहलक गमहि चलल छी चोर । हम करइत
छी गञ्जन तोर ।।
बुझल नहि अछि दशकण्ठ प्रताप । चललहुँ
अहाँ कतय चुपचाप ।।
चुप रह कहलैं पढलक गारि । चट दय लात चलौलक
मारि ।।
वाम मुष्टि हरि हनल सुतारि । खसली अवनीमे ओहारि ।।
शोणित बान्ति करय कय बेरि ।
करति कि यहन उपद्रव फेरि ।।
लंका देवि विकला कान वरिया काँ नहि लागय
बान ।।
पूर्व्व विरञ्चि कहल छल जैह । अनुभव होइछ भेल
की सैह ।।

हनुमानजी प्रभु रामकेँ चरणक स्मरण करैत रातिकेँ
सुक्ष्म रुप धारण कय लँका नगरीमे प्रवेश केला ,
मुदा लंकणी नामक राक्षसणी हुनका देखि टोकैत
अछि , संगहि एक लात सेहो मारैत अछि ।

प्रत्युत्तरमे हनुमानजी अपन बाँमा हाथ सँ
ओकरा कान पर प्रहार करैत छथि । एहि प्रहार
सँ ओय राक्षसीकेँ कान सँ शोणित बहराय लगैत
अछि आ पूर्वक ब्रह्माक एकटा वचन
सेहो एहि प्रहार सँ ओकरा याद अबैत अछि ।

षट्पद

नारायण अवतार राम त्रेता मे हयता ।
पिता-वचन सहबन्धु जानकी संगहि जयता ।।
माया-सीता ततय मूढ दशकन्धर हरता ।
बालि मारि सुग्रीव संग प्रभु मैत्री करता ।।
अहाँ काँ(केँ) तनिकर दूत कपि , मारि मुक्का विकला करत ।
कहलनि विधि शुनु लंकनि , तखन बूझव रावण मरत।।

लंकनिकेँ पूर्वमे ब्रह्मा द्वारा ई बचन कहल गेल छल , जे सीता मायकेँ हरणक बाद रामदूत जखन अहाँक मारि आहत करता तँ बूझब आब रावणक मृत्य नजदीक अछि ।
चौपाइ

वनिता-उपवन तरुण अशोक ।
महा भयंकरी राक्षसि लोक ।।
जनक-नन्दिनी छथि तहिठाम । शोभित वृक्ष
शिंशपा नाम ।।
कि कहब शोभा देखब जाय । हमहूँ धन्या दर्शन
पाय ।।
विजय बनल अछि यश अवदात ।
हमरा हानि कि सहि आघात ।।
देखब राम नवल-घनश्याम । अयोता शीघ्र रहब
एहिठाम ।।
सुनि हरि हँसल चलल उत्साह । घरहिक
भेदिया लंका डाह ।।
जखन पवन-सुत रघुपति-चार । दुर्ग-
महोदधि उतरल पार ।।
दशमुख वाम अंग भुज नयन । फरकय लाग अभागक
अयन ।।
भल मन सगुन सकल फल जान । कालक त्रास न
दशमुख मान ।।

रामदूत वीर हनुमानक प्रहार सँ आहत लंकनिकेँ
जखन पूर्वक बातक ज्ञान होइत अछि , कि आब
रावणकेँ अंत निकट अछि आ भगवान राम
लंका अयोता , तखन लंकनि हनुमानजी केँ
सीता माएकेँ पता बता दैत छथिन ।
हनुमानजी पता सुनि हसैत चलि जाइत छथि ।
ओहि रावण केँ वाम आँखि फड़कति अछि , जे अशुभक
लक्षण छी ।
कहू रामदूत वीर हनुमान की जाय ।

कविवर चन्दा झा विरचित मिथिला भाषा रामायणकेँ सुन्दर काण्डक प्रथम अध्याय समाप्त भेल ।

जय मिथिला:-

प्रथम अध्य समाप्त
साभार,
कृष्णानंद चौधरी
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1 टिप्पणियाँ:

Dev Kumar 16 फ़रवरी 2017 को 7:26 pm  

Great post, thanks for sharing.traditional stuff..Excellent work..
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