गुरुवार, 17 नवंबर 2011

डीहक जमीन


डीहक जमीन
ट्रेन सकरी टीशन सँ फूजल आ पूब दिस घुसक' लागल। नरेश एकटा बोगी मे अपना सीट पर बैसल अपन गामक बात सब मोन पाडैत विचारमग्न भ' गेल। बहुत दिनक बाद ओ अपन गाम जा रहल छल। भरिसक १० बरखक बाद। ओ एखन भोपाल मे शिक्षा विभाग मे नौकरी करैत छल अधिकारीक पद पर। गाम जाय लेल चिकना टीशन उतरि क' जाय पडै छलै। सकरी तक बडी लाईनक ट्रेन चलैत अछि। ओतय सँ फेर छोटी लाईनक ट्रेन सँ। ओकरा बोगी मे पूरा लोक कोंचल छल। चारि पसिन्जरक सीट पर सात-आठ लोक बैसल छल। हो-हल्ला आओर गप-शप सँ पूरा डिब्बा मे कोलाहल जकाँ छलै। मुदा ओकर दिमाग मे अपन पुरनका दिन घुरिया लगलै। सबटा दृश्य चलचित्र जकाँ ओकर आँखिक आगाँ घूम' लगलै। ओ अपना केँ २० बरख पहिनुका स्कूल मे देख' लागल। बस्ता ल' के नित भोरे पाठशाला जेबाक दृश्य आगाँ मे नाच लगलै। ओकर पिता फेंकन मरड हरवाह छला आओर गाम मे भुटकुन बाबू ओतय खेतीक आ माल-जालक काज करै छला। किछ बटाई पर खेती सेहो करै छला। अपन जमीनक नाम पर पाँच कट्ठा खेतीक जमीन आ आठ धूरक घरारी छलैन्हि। हुनकर माय 'मरौनावाली' केर नाम सँ जानल जाईत छलीह। भरि दिन मरौनावाली भुटकुन बाबू ओतय घरेलू काज मे मदति करैत छलीह आ साँझे घर आबै छलीह। नरेश बच्चा छलाह आ भरि दिन एम्हर ओम्हर खेलाइत रहैत छलाह। एक दिन भुटकुन बाबू फेंकन केँ कहलखिन्ह जे नरेशवा भरि दिन टौआइत रहै छौ, कियाक नै ओकरा हमरा एहिठाम चरवाही मे पठा दैत छी। फेंकन बजलाह- "गिरहत, ई गप नै कहियौ, ओ एखन मात्र चारि बरख के छै। ओकरा अगिला बरख सँ स्कूल पठेबै।" भुटकुन बाबू व्यंग्य मे बजलाह- "तौं त' एतबे टा सँ हमरा एहिठाम चरवाही करै छलैं। तखन तोहर बाबू हरवाही करै छलखुन्ह, मोन छौ ने।" फेंकन कहलक- "जी ओ जमाना आब नै छै गिरहत। मरौनावाली एकदम जिद केने छै जे नरेशबा केँ स्कूल पठबियो। किछ दिन पहिने बिसेसर बाबू मास्टर साहब भेंटल छलाह। ओ कहलथि जे पढेनाई बड्ड जरूरी छै तैं नरेशबा केँ स्कूल पठाबहक।" भुटकुन बाबू- "जे तोहर इच्छा। हम त' तोरे दुआरे कहलियो। तोहर काज किछ हल्लुक भ' जइतो।" फेंकन- "गिरहत, हम जा धरि सकब, ता धरि अहाँ केँ काज करैत रहब।"
अगिला साल नरेशक नाम स्कूल मे लिखाओल गेल। नरेश पढै मे नीक छलाह आ जल्दिये मास्टर सबहक प्रिय भ' गेलाह। दसवीं बोर्ड मे ओकरा अस्सी प्रतिशत अंक आयल। ओ काओलेज मे पढै लेल दरिभंगा चलि आयल आओर ट्यूशन पढा केँ अपन खर्च निकालैत पढ' लागल। ओम्हर गाम मे फेंकन आओर मरौनावाली भुटकुन बाबूक काज मे लागल रहल। नरेशक पढाई पूरा भेलै आ मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोगक इम्तिहान पास क' के शिक्षा विभाग मे नौकरी भेंटलै। नियुक्ति पत्र गामक पता पर आयल छल आओर सौंसे गाम अनघोल भ' गेल रहै। ओहि दिन नरेश अपना केँ आकाश मे उडैत पाओलक। भुटकुन बाबू जे आब वृद्ध भ' गेल छलाह ओहो नरेश केँ बजा के आशीर्वाद देलखिन्ह। मरौनावाली त' कानैत बेहाल छल जे बेटा आब नजरि सँ दूर भ' जायत। किछ दिनक बाद नरेशक बियाह भ' गेलै। किछ दिन कनियाँ गामे मे रहलैन्हि। फेर जयबाक जिद क' देलकै। नरेश कनियाँ केँ ल' के भोपाल चलि गेल। मरौनावाली ओहि दिन बड्ड कानल रहै। नरेश अपन माता पिता कैँ संगे रहै लेल बहुत आग्रह केलक, मुदा फेंकन साफ मना क' देलकै। ओकर कहनाई रहै जे पुरखाक डीह छोडि नै जायब। नरेश कहलक जे ई आठ धूर डीह अहाँ केँ एतेक प्रिय भ' गेल जे अपन एकलौता संतान संगे रहै लेल तैयार नै छी। ओतय नाना प्रकारक सुविधाक गप सेहो नरेश कहलकै, मुदा फेंकन अपन जिद पर अडल रहलाह। मरौनावाली कनी जिद केलखिन्ह, त' फेंकन खिसिया गेला आओर कहलखिन्ह जे अहाँ चलि जाउ, हम असगरे रहब। मरौनावाली धर्मसंकट मे पडि गेली आ अंत मे गामे मे रहै केँ निर्णय लेलथि। नरेश नियमित रूप सँ गाम पाई पठबैत रहै आओर फेंकन के हरबाही जबरदस्ती छोडा देलक। फेंकन साल दू साल पर नरेश लग जाइत रहै छलाह आओर नरेश काजक अधिकता आओर बच्चा सबहक पढाई दुआरे गाम कहियो नै आबैत छलाह। आब मोबाइलक जमाना मे नरेश फेंकन केँ मोबाइल सेहो कीन देने छलखिन्ह, जाहि सँ ओ सब नियमित रूप सँ सम्पर्क मे रह' लगलाह। एक दिन फेंकन मोबाइल सँ नरेश केँ फोन केलखिन्ह आ कहलखिन्ह- "बौउआ, अपन डीह सँ सटल भुटकुन बाबू केर दू कट्ठा जमीन परती पडल छै। ओ ओहि जमीन केँ बेच' चाहैत छैथ। हमरा कहलैथ जे तौं ओ जमीन कीनब' त' हम तोरा पच्चीसे हजार मे द' देब'। बौउआ ओहि जमीनक कीमत चालीस हजार सँ कम नै छै। नीक मौका छै। पाई पठा दितहक त' हम तोरे नाम सँ वा तोहर कनियाँक नाम सँ जमीन कीन दितिय'।" नरेश चोट्टे खिसिया गेल आ बाजल- "हमरा गाम सँ कोनो मतलब नै अछि। अहाँ बलौं जमीन कीन' चाहै छी। हम त' सोचै छी जे आठ धूरक डीह आ पाँच कट्ठा खेतीवाला जमीन बेची आओर गाम सँ पिण्ड छोडाबी।" फेंकन- "हमरा जीबैत ई काज नै हेतौ। पुरखाक जमीन बेचबाक बात तोहर मोन मे कोना केँ एलौ। तू ओहि गाम सँ पिण्ड छोडेबाक गप करै छ, जतय नेना मे खेलेलह, जतुक्का पानि पीबि केँ नमहर भेल', जतय तोहर बाप-दादा केर सारा छ। तू डीहक नबका जमीन नै कीन, मुदा पुरनका बेचै केँ गप नै कर।" अस्तु नबका घरारी कीनबाक गप एतहि खतम भ' गेल।
एक दिन नरेशक बडकी बेटी सुनन्दा, जे चौथा मे पढै छल, नरेश केँ कहलक- "पापा, जेना हम अहाँ संगे रहै छी, अहूँ त' बच्चा मे बाबा संगे रहैत हैब।" नरेश- "हाँ, रहैत छलहुँ। सब रहैत अछि।" सुनन्दा- "अहाँ के सब गप मानैत हेता बाबा।" नरेश- "हाँ यथासम्भव मानैत छलाह।" सुनन्दा- "अहाँ बड्ड नीक छी पापा। हमर सब गप पूरा करै छी। हमहुँ नमहर भ' केँ अहाँक सब गप जरूर मानब।" ई कहैत ओ खेलाई लेल चलि गेल। ओकर अन्तिम वाक्य सुनि नरेश धक् रहि गेल। ओकरा अपन नेनपनक सब गप मोन पडय लागलै, जे कोना फेंकन फाटल धोती पहिरैत रहल, कोना मरौनावाली फाटल नुआ पहिरैत रहलीह, मुदा नरेशक पढाई मे कोनो बिथुत नै हुअ देलखिन्ह। एक बेर त' नरेश केँ फार्म आ किताब लेल पाँच सय टका भुटकुन बाबू सँ पैंच लेबा मे कोन कोन गप नै फेंकन केँ सुन' पडल छलै। नरेशक मोन मे विचारक तूफान उठि गेल। ओ घर सँ बाहर निकलि केँ घूम' लागल। घूमैत पार्क दिस चलि गेल। ओतय एकटा गाछ पर एकटा चिडै अपन बच्चा सब केँ चोंच मे दाना दैत छल। ओकर हृदय फाट' लागलै। पण्डितजी केर संस्कृतक कक्षा मोन पड' लागलै जाहि मे ओ "जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसि" पर लगातार दू घन्टी पढबैत रहि गेल छलखिन्ह। ओ कक्षा नरेश केँ बड्ड नीक लागल रहै। कतेक दिन धरि ओ एहि श्लोकक पाठ करैत रहै छल। एहि विषय पर वाद विवाद प्रतियोगिता मे सेहो ओ नीक बाजल छल आओर जिला स्तर पर पुरस्कार सेहो भेंटल छलै। ओ एकटा निर्णय लेलक आओर डेरा आबि केँ कनियाँ सँ कहलक- "हमर अटैची तैयार क' दिय'। हम गाम जायब।" कनियाँ बाजलैथ- "इ की बाजै छी। ओतय एखन जा क' की करब? दस बरख सँ उपर भेल गाम गेला। के चिन्हत? बाबूजी सँ नित गप होयते अछि।" नरेश- "डीहक जमीन कीनै लेल जाइत छी।" कनियाँ- "इ कोन बतहपनी धेलक अहाँ केँ।" नरेश- "बताह त' एखन धरि छलहुँ। आब ठीक भ' गेलौं। जाहि मातृभूमि केर माटि-पानि सँ हमर देह पोसल अछि, जे मातृभूमि हमरा हमर पहचान देलक, ओकरा हम बिसरि गेल छलौं। माय-बाबूक आकांक्षा आ मनोरथ बिसरि गेल छलौं। एतय भोपाल मे सब सुविधा अछि, मुदा जे अपनैती हमरा गाम मे भेंटैत रहै तकर अभाव बुझाइत रहै ए। आब गाम साल मे एक बेर त' जरूर जायब।" कनियाँ कनी काल घमर्थन केलकैन्हि, मुदा हुनकर जिद आ दृढताक आगाँ चुप भ' गेलै।
एकाएक नरेशक भक् टूटल। बगलक यात्री, जिनका सँ सकरी मे परिचय भेल रहैन्हि, हुनका हिलबैत कहैत रहै जे श्रीमान् चिकना आबि गेलै, कतेक सुतब, उतरू नै त' ट्रेन फूजि जैत। मुस्की मारैत नरेश बजलाह- "नै यौ, आब जागि गेल छी। एखन धरि सुतल छलहुँ।" इ कहैत ओ टीशन पर उतरि गेल आ गाम दिस चलि देलक। डेग जेना हल्लुक भ' गेल रहै आ तुरन्ते गाम पहुँचि गेल। फेंकन एकाएक नरेश केँ देखलक त' आश्चर्य भेलै आओर मरौनावाली भरि पाँज मे बेटा केँ पकडि कान' लागल। नरेश फेंकन के गोर लागि केँ कहलक- "बाबू, हम आबि गेलौं डीहक जमीन कीनबाक अछि ने।"
साँझ मे दुनू बापूत भुटकुन बाबू लग गेलाह। भुटकुन बाबू नरेश केँ आशीर्वाद दैत कहलखिन्ह- "गाम केँ कोना बिसरि गेलहक?" नरेश- "नै बाबा, बिसरल नै छलौं, कतौ हरा गेल छलौं। आब आबि गेलौं। डीहक जमीन कीनै लेल।" भुटकुन बाबू हँसैत बजलाह- "चल काल्हिये रजिस्ट्री क' दैत छियो। पाई आगाँ पाँछा द' दिह'।" नरेश- "पाई आनने छी बाबा।"
साँझ मे फेंकनक छोट दलान लोक सँ भरल छल। मरौनावाली रहि रहि के चाह बनाबैत छल। नरेशक गाम मे आओर ओकर घर मे जेना पावनि-तिहारक चुहचुही छलै।

1 टिप्पणियाँ:

kumar 17 नवंबर 2011 को 6:24 pm  

Bahut Nik....Mumsparshi aa prerna daye rachna....Man sai Dhanyawad....

Kumar Kali Bhushan

Mumbai - Keoti - Darbhanga

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