सोमवार, 28 नवंबर 2011

गजल


आइ-काल्हि सदिखन हम अपने सँ बतियाईत रहै छी।
लोक कहै ए जे हम नाम अहींक बडबडाईत रहै छी।

सब बैसार मे आब चर्चा कर' लागलौं अहींक नाम केर,
सुनि केँ कहै छै सब जे निशाँ मे हम भसियाईत रहै छी।

हमरा लागै ए निशाँ आब टूटि गेल छै पीबि लेला केँ बाद,
सोझ रहै मे छलौं अपस्याँत, आब डगमगाईत रहै छी।

एते बेर नाम लेलौं अहाँक हम, कहियो त' सुनने हैब,
कोन कोनटा मे नुकेलौं अहीं केँ ताकैत बौआईत रहै छी।

एक चुरू अपने हाथ सँ आबि केँ पीया दितिये जे "ओम" केँ,
मरि जइतौं आराम सँ हम, जाहि लेल टौआईत रहै छी।
----------------------- वर्ण २२ -----------------------

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