शुक्रवार, 11 नवंबर 2011

सुंदर सागर पोखेर में मेहँदी के -


प्रिय प्रीतम के आँखि में प्यार के चमक अखनो छैन
मगर हुनका हमर मोहब्त पर सक आइयो छैन//

नाँव में बैस धोने छलैथ हाथ कहियो
सुंदर सागर पोखेर में मेहँदी के गमक आइयो छैन //
प्रिय प्रीतम के छु नहीं पैलो प्यार कहियो
लेकिन हमर होँट पर हुनकर होँट के झलक आइयो छैन
//

सब बेर पुछै छथि हमर चाहत के सवाल

ओनाहिये प्यार के परखनाय आइयो छैन
//

नै रैह पौती प्रिय प्रीतम हमरा बिना

दुनू तरप प्यार के धध्क आइयो आछि //

रचनाकार :- अजय ठाकुर (मोहन जी)

1 टिप्पणियाँ:

jyotish seva sadan"jha shastri" 11 नवंबर 2011 को 8:51 pm  

मिथिला के "मैथिल और मैथिली" कल्पना से भी पड़े हैं ?" विधाता ने सृष्टि की अनमोल रचना की | उस अनमोल रचना में मिथिला {मिथिलांचल }अर्थात आदि शक्ति की भूमि की गाथा एक उपहार स्वरुप है , जो शायद कल्पना से भी पड़े है | कभी इस भूभाग पर भष्म का मंथन से राजा-मिथी,विदेह ,मिथिलेश न जाने कितने नामों से विख्यात हुए | जिस प्रकार से मिथिला कल्पना से भी पड़े है ,ठीक इसी प्रकार से -यहाँ के राजा अर्थात -जनक भी कल्पना से पड़े थे | राज्य को चलाने के लिए ,किसी भी राजा को शस्त्र उठाने पड़ते हैं ,किन्तु -महराजा जनक ने शस्त्र नहीं शास्त्रों से राज्य को चलाया | इस "मिथिला और मैथिल " की विशेषता की बात करें -विद्या- अर्थात जन -जन के मन में और विचार में माँ शारदा का निरंतर निवास रहता है | इसी कारण से एक छोटी सी नगरी के लोग विश्व में विद्या के बल पर छा जाते हैं | वैभव -मिथिला के लोग -वैभव को सर्वोपरि मानते हैं -जब तो पुत्र से भी अधिक दामाद को मानते हैं |संसार में -बेटी और दामाद का जो सम्मान मिथिला में होता है ,शायद यह अलोकिक ही है |वैभव -रहन -सहन के साथ -साथ प्रकृति के साथ चलना ,मान सम्मान के लिए ही जीते हैं | शांति के पुजारी -आज अगर विश्व में छाये हैं तो -शांति का स्वरुप ही इनकी शान होती है ,क्योकि जो ज्ञानी होते हैं ,वो विवेक के पथ पर ही चलते हैं ,इस लिए ये अडिग रहते हैं | पर सेवा =विश्व में -सेवा भाव से ही समर्पित रहना परम लक्ष होता है | मैथिल के अभिभावक -यद्यपि -धन विहीन होते हैं ,किन्तु ,कान्ति,चमक ,संस्कार ,मान सम्मान के सबसे धनी होते हैं -यही कारण है -मैथिल -मिथिला से दूर होकर भी -अपनी छाप बरकरार रखते हैं | मिथिला -की नारी -भी संस्कार के अग्रगणी होती हैं -अपनी संस्कृति और संस्कारों को सात समुन्दर पार ले जाने में हिचकती नहीं हैं | धन्य हैं मिथिला के अभिभावक -जो किसी जन्म के पुन्य के प्रताप से निर्धन होते हुए भी अपनी संतानों के द्वरा सर्वगुण संपन्न होते हैं | साथ ही धन्य हैं मिथिला के मैथिल जो -अपने संस्कारों के बल पर निर्धन होते हुए भी आसमान को छू लेते हैं || भवदीय निवेदक "ज्योतिष सेवा सदन "झा शास्त्री "{मेरठ उत्तर प्रदेश } निःशुल्क ज्योतिष सेवा रात्रि ८ से९ मित्र बनकर कोई भी प्राप्त कर सकते हैं | संपर्क सूत्र -०९८९७७०१६३६,०९३५८८८५६१६,

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