गुरुवार, 24 नवंबर 2011

गजल


एकटा खिस्सा बनि जइते अहाँ संकेत जौं बुझितहुँ।
हमही छलहुँ अहाँक मोन मे कखनो त' कहितहुँ।

लोक-लाजक देबाल ठाढ छल हमरा अहाँ केँ बीच,
एको बेर इशारा दितियै हम देबाल खसबितहुँ।

अहाँक प्रेमक ठंढा आगि मे जरि केँ होइतौं शीतल,
नहुँ-नहुँ भूसाक आगि बनि केँ किया आइ जरितहुँ।

सब केँ फूल बाँटै मे कोना अपन जिनगी काँट केलौं,
कोनो फूल नै छल हमर, काँटो त' अहाँ पठबितहुँ।

जाइ काल रूकै लेल अहाँ "ओम" केँ आवाज नै देलियै,
बहैत धार नै छलहुँ हम जे घुरि केँ नै अबितहुँ।
------------------ वर्ण २० ---------------------

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